Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 55
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VṛttiGovind
LSK 1184
इनि-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
इष्टादिभ्यश्च
Aṣṭādhyāyī 5.2.88
Vṛtti Varadarājācārya

इष्टमनेन इष्टी। अधीती।

इति भवनाद्यर्थकाः॥५५॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अकार का लोप, वर्णसम्मेलन करके कृतपूर्विन् बना। इससे शार्ङ्गी की तरह सौ च से दीर्घ करके कृतपूर्वी, कृतपूर्विणौ, कृतपूर्विणः आदि रूप बनते हैं।

११८४- इष्टादिभ्यश्च। इष्टम् आदिर्येषां ते इष्टादयस्तेभ्यः। इष्टादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। पूर्वादिनिः से इनिः और श्राद्धमनेन भुक्तमिनिठनौ से अनेन की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, समर्थानां प्रथमाद्वा और तद्धिताः का अधिकार आ ही रहा है।

प्रथमान्त इष्ट आदि शब्दों से 'अनेन' अर्थ में इनि प्रत्यय होता है।

इष्टादिगण में इष्ट, पूर्त, उपासादित, निगदित, परिगदित, निराकृत, पूजित, परिगणित आदि अनेक शब्द आते हैं।

इष्टी। यज्ञ कर चुका व्यक्ति। इष्टम् अनेन ऐसा विग्रह है। इष्ट सु में इष्टादिभ्यश्च से इनि प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके इष्ट+इन् बना। भसंज्ञक अकार का लोप, वर्णसम्मेलन करके इष्टिन् बना। इससे पूर्वी की तरह सौ च से दीर्घ करके इष्टी, इष्टिनौ, इष्टिनः आदि रूप बनते हैं।

अधीती। अध्ययन कर चुका व्यक्ति। अधीतम् अनेन ऐसा लौकिक विग्रह है। अधीत सु में इष्टादिभ्यश्च से इनि प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अधीत+इन् बना। भसंज्ञक अकार का लोप, वर्णसम्मेलन करके अधीतिन् बना। इससे पूर्वी की तरह सौ च से दीर्घ करके अधीती, अधीतिनौ, अधीतिनः आदि रूप बनते हैं।

इसी तरह पठितमनेन- पठीती, उपकृतमनेन उपकृती, पूजितमनेन- पूजिती, संरक्षितमनेन संरक्षिती आदि प्रयोग बनाये जाते हैं। स्मरण रहे कि क्तस्येन्विषयस्य कर्मण्युपसंख्यानम् वार्तिक से इस् इन्नन्त शब्द के योग में सप्तमी विभक्ति हुआ करती है। जैसे- पठिती व्याकरणे, अधीती शास्त्रे, पूजिती देवेषु आदि वाक्य बनते हैं।

परीक्षा

इस प्रकरण के सभी सूत्रों एवं उनके अर्थों पर प्रकाश डालते हुए किन्हीं बीस प्रयोगों की सिद्धि दिखाइये।

श्री वरदाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

भवनाद्यर्थकप्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ मत्वर्थीयाः