Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 55
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VṛttiGovind
LSK 1183
इनि-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
सपूर्वाच्च
Aṣṭādhyāyī 5.2.87
Vṛtti Varadarājācārya

कृतपूर्वी।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

‘तदधीते’ इस अर्थ में छन्दस् शब्द के स्थान ‘श्रोत्र’ आदेश और घन् प्रत्यय का निपातन किया जाता है।

घन् में नकार इत्संज्ञक है, फलतः नित्-स्वर आद्युदात्त होगा। इस सूत्र में तावतिथं ग्रहणमिति लुग्वा से वा की अनुवृत्ति की जाती है। अतः यह कार्य विकल्प से होता है।

श्रोत्रियः। वेदों का अध्येता। छन्दोऽधीते इस अर्थ में छन्दस् अम् से तदधीते तद्वेद से अण् प्राप्त था, उसे बाधकर के श्रोत्रियँश्छन्दोऽधीते से छन्दस् के स्थान पर श्रोत्र आदेश और घन् प्रत्यय का निपातन हुआ। नकार की इत्संज्ञा, लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके श्रोत्र+घ बना। केवल घ् के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से इय् आदेश होकर श्रोत्र+इय बना। भसंज्ञक अकार को लोप करने पर श्रोत्र+इय, वर्णसम्मेलन होकर श्रोत्रिय बना और स्वादिकार्य होकर श्रोत्रियः सिद्ध हुआ। निपातन न होने के पक्ष में तदधीते तद्वेद से अण् होकर छान्दसः भी बनता है।

११८३- सपूर्वाच्च। पूर्वेण सह सपूर्वम्, तस्मात्। सपूर्वात् पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदं सूत्रम्। पूर्वादिनिः यह पूरा सूत्र अनुवृत्त होता है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, समर्थानां प्रथमाद्वा और तद्धिताः का अधिकार चला आ रहा है।

जिसके पूर्व में अन्य कोई भी शब्द विद्यमान हो ऐसे पूर्व शब्द से ‘अनेन’ इस अर्थ में इनि प्रत्यय होता है।

कृतपूर्वी। पहले कर चुका व्यक्ति। पूर्व कृतम् अनेन ऐसा विग्रह है। पूर्व अम् कृत सु में सह सुपा से समास करके कृतपूर्व बना है। अब कृतपूर्व सु में सपूर्वाच्च से इनि प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके कृतपूर्व+इन् बना। भसंज्ञक