Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 55
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VṛttiGovind
LSK 1178
थुगागमविधायकं विधिसूत्रम्
षट्कतिकतिपयचतुरां थुक्
Aṣṭādhyāyī 5.2.51
Vṛtti Varadarājācārya

एषां थुगागमो स्याड्डटि। षण्णां पूरणः षष्ठः। कतिथः।

कतिपयशब्दस्यासङ्ख्यात्वेऽप्यत एव ज्ञापकाड्डट्। कतिपयथः। चतुर्थः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११७८- षट्कतिकतिपयचतुरां थुक्। षट् च कतिश्च कतिपयश्च चतुश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः षट्कतिकतिपयचतुरः, तेषाम्। षट्कतिकतिपयचतुरां षष्ठ्यन्तं, थुक् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तस्य पूरणे डट् से विभक्तिविपरिणाम करके डटि की अनुवृत्ति आती है।

डित् के परे रहते षष्, कति, कतिपय और चतुर् शब्दों को थुक् का आगम होता है।

थुक् में उकार और ककार इत्संज्ञक हैं, थ् शेष रहता है। कित् होने के कारण शब्द के अन्त में बैठता है किन्तु वर्णसम्मेलन होकर डट् वाले अकार में मिल जाता है।

षष्ठः। छठवीं संख्या का पूरण, छठवाँ। षष्णां पूरणः लौकिक विग्रह और षष् आम् अलौकिक विग्रह है। तस्य पूरणे डट् से डट्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, षष्+अ बना है। षट्कतिकतिपयचतुरां थुक् से षष् को थुक् का आगम, अनुबन्धलोप, षष्+थ्+अ बना। षकार से परे थकार को ष्टुना ष्टुः से टुत्व होकर ठ बना और वर्णसम्मेलन होकर षष्ठ बना। सु, रुत्वविसर्ग करके षष्ठः सिद्ध हुआ।

कतिथः। कितनी संख्या का पूरण, कौन-सा। कतीनां पूरणः लौकिक विग्रह और कति आम् अलौकिक विग्रह है। तस्य पूरणे डट् से डट्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, कति+अ बना है। षट्कतिकतिपयचतुरां थुक् से कति को थुक् का आगम, अनुबन्धलोप, कति+थ्+अ=कतिथ बना। सु, रुत्वविसर्ग करके कतिथः सिद्ध हुआ।

कतिपयथः। कुछ एक संख्या का पूरण, कुछेकवाँ। कतिपयानां पूरणः लौकिक विग्रह और कतिपय आम् अलौकिक विग्रह है। तस्य पूरणे डट् से डट्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, कतिपय+अ बना है। षट्कतिकतिपयचतुरां थुक् से कतिपय को थुक् का आगम, अनुबन्धलोप, कतिपय+थ्+अ=कतिपयथ बना। सु, रुत्वविसर्ग करके कतिपयथः सिद्ध हुआ।

चतुर्थः। चार संख्या का पूरण, चौथा। चतुण्णां पूरणः लौकिक विग्रह और चतुर् आम् अलौकिक विग्रह है। तस्य पूरणे डट् से डट्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा,