Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 55
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VṛttiGovind
LSK 1177
तिलोपविधायकं विधिसूत्रम्
ति विंशतेर्डिति
Aṣṭādhyāyī 6.4.142
Vṛtti Varadarājācārya

विंशतेर्भस्य तिशब्दस्य लोपो डिति परे। विंशः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अष्टाध्यायी के क्रम में विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम् यह महत्त्वपूर्ण सूत्र है किन्तु लघुसिद्धान्तकौमुदी में यह पढ़ा नहीं गया है। जिज्ञासुओं के लिए उसका अर्थपरिचय यहाँ पर कराया जा रहा है- विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम्। विंशत्यादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, तमड् प्रथमान्तं, अन्यतरस्यां सप्तम्यन्तं त्रिपदमिदं सूत्रम्। विंशति, त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चाशत्, षष्टि, सप्तति, अशीति, नवति, शतम् आदि से परे डट् को तमड् आगम होता है। तमड् में अड् इत्संज्ञक है और तम् शेष बचता है तथा डट् वाले अकार से मिलकर तम बन जाता है जिससे विंशतितमः (बीसवाँ), त्रिंशत्तमः (तीसवाँ) चत्वारिंशत्तमः (चालीसवाँ) पञ्चाशत्तमः (पचासवाँ) षष्टितमः (साठवाँ) सप्ततितमः (सत्तरवाँ) अशीतितमः (अस्सीवाँ) नवतितमः (नब्बेवाँ) शततमः (सौवाँ) ये शब्द बन सकते हैं। ११७७- ति विंशतेर्डिति। ति लुप्तषष्ठीकं पदं, विंशतेः षष्ठ्यन्तं, डिति सप्तम्यन्तं त्रिपदमिदं सूत्रम्। अल्लोपोऽनः से एकदेश लोपः की अनुवृत्ति और भस्य का अधिकार है।

डित् परे होने पर विंशति के अवयव भसंज्ञक ति का लोप होता है।

विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम् से तमड् न होने के पक्ष में इससे ति का लोप हो जाता है।

विंशः। बीस सङ्ख्या का पूरण, बीसवाँ। विंशतेः पूरणः लौकिक विग्रह और विंशति डन्स् अलौकिक विग्रह है। तस्य पूरणे डट् से डट्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके विंशति+अ बना। विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम् से वैकल्पिक तमड् आगम, अनुबन्धलोप, तम्+अ=तम=विंशतितम बना, सु, रुत्वविसर्ग करके विंशतितमः सिद्ध हुआ। तमड् न होने के पक्ष में डट् के परे टिलोप प्राप्त था, उसे बाधकर तिविंशतेर्डिति से ति का लोप हुआ, विंश बना। सु, रुत्वविसर्ग करके विंशः सिद्ध हुआ। स्त्रीलिङ्ग में विंशतितमी और विंशी बनता है तथा नपुंसकलिङ्ग में विंशतितमम् और विंशम् बनता है।

त्रिंशः। तीस सङ्ख्या का पूरण, तीसवाँ। त्रिंशतः पूरणः लौकिक विग्रह और त्रिंशत् डन्स् अलौकिक विग्रह है। तस्य पूरणे डट् से डट्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके त्रिंशत्+अ बना। विंशत्यादिभ्यस्तमडन्यतरस्याम् से वैकल्पिक तमडागम, अनुबन्धलोप, तम्+अ=तम, त्रिंशत्+तम=त्रिंशत्तम बना, सु, रुत्वविसर्ग करके त्रिंशत्तमः सिद्ध हुआ। तमड् न होने के पक्ष में डट् के परे अत् इस टि का टेः से लोप करके त्रिंश्+

अ=त्रिंश बना। सु, रुत्वविसर्ग करके त्रिंशः सिद्ध हुआ। स्त्रीलिङ्ग में त्रिंशत्तमी और त्रिंशी बनता है तथा नपुंसकलिङ्ग में त्रिंशत्तमम् और त्रिंशम् बनता है। इसी तरह चत्वारिंशत्तमः, चत्वारिंशः आदि भी बनाते जाइये।