डटो मडागमः। पञ्चानां पूरणः पञ्चमः। नान्तात् किम्? विंशः।
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असङ्ख्यादेः किम्? एकादशः।
अवयवौ अस्य लौकिक विग्रह और उभ औ अलौकिक विग्रह है। सङ्ख्याया अवयवे तयप् से तयप्प्रत्यय, अनुबन्धलोप, उभादुदात्तो नित्यम् से तय के स्थान पर अयच् आदेश, अनुबन्धलोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करने पर उभ+अय बना। भसंज्ञक अकार का लोप करने पर उभ्+अय=उभय बना और सु, अम् करके उभयम् सिद्ध हुआ।
११७६- नान्तादसङ्ख्यादेर्मट्। न अन्तो यस्य तत् नान्तं, तस्मात्। सङ्ख्या आदिर्यस्य स सङ्ख्यादिः, न सङ्ख्यादिरसङ्ख्यादिस्तस्मादसङ्ख्यादेः। नान्तात् पञ्चम्यन्तं, असङ्ख्यादेः पञ्चम्यन्तं, मट् प्रथमान्तं त्रिपदमिदं सूत्रम्। तस्य पूरणे डट् से षष्ठी में विभक्तिविपरिणाम करके डटः की अनुवृत्ति आती है।
जिसके आदि में कोई सङ्ख्याशब्द न जुड़ा हो, ऐसे नकारान्त सङ्ख्यावाचक प्रातिपदिक से परे डट् को मट् का आगम होता है।
टकार इत्संज्ञक है, टित् होने के कारण डट् के आदि में बैठेगा।
पञ्चमः। पाँचवीं संख्या को पूर्ण करने वाला, पाँचवाँ। पञ्चानां पूरणः लौकिक विग्रह और पञ्चन् आम् अलौकिक विग्रह है। तस्य पूरणे डट् से डट्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पञ्चन्+अ बना। नान्तादसङ्ख्यादेर्मट् से मट् का आगम, अनुबन्धलोप, टित् होने के कारण आद्यन्तौ टकितौ के नियम से डट् वाले अकार
के आदि में बैठा, म और डट् वाले अकार में पररूप होने पर पञ्चन्+म बना। इसमें अन् टि है, उसका टेः से लोप नहीं हुआ, क्योंकि म हल् होने के कारण उसके परे रहते भसंज्ञा न होकर स्वादिष्वसर्वनामस्थाने से पदसंज्ञा हुई है। न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से नकार का लोप होकर पञ्चम बना और सु, रुत्वविसर्ग करके पञ्चमः सिद्ध हुआ। इसी प्रकार सप्तमः, नवमः, अष्टमः, दशमः आदि बनाइये।
असङ्ख्यादेः किम्? एकादशः। यदि नान्तादसङ्ख्यादेर्मट् में असङ्ख्यादेः न कहते तो सङ्ख्यादि एकादशन् आदि में भी मट् आगम होकर एकादशमः आदि अनिष्ट रूप बन जाते। अतः ऐसा न हो इसके लिए असंख्यादेः पढ़ा गया। एकादशन् में तो एक संख्या आदि में है, सो यहाँ नहीं हुआ। यहाँ पर डट् के परे टिलोप होकर एकादशः, द्वादशः, त्रयोदशः आदि बनते हैं।