Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 55
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VṛttiGovind
LSK 1175
पूरणार्थे डट्प्रत्यविधायकं विधिसूत्रम्
तस्य पूरणे डट्
Aṣṭādhyāyī 5.2.48
Vṛtti Varadarājācārya

एकादशानां पूरणः- एकादशः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११७५- तस्य पूरणे डट्। तस्य षष्ठ्यन्तं, पूरणे सप्तम्यन्तं, डट् प्रथमान्तं त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में सङ्ख्याया गुणस्य निमाने मयट् से सङ्ख्यायाः की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार पूर्ववत् आ रहा है।

सङ्ख्यावाचक षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक से पूरण अर्थ में डट् प्रत्यय होता है।

डकार और टकार की इत्संज्ञा होती है। टित् का फल स्त्रीलिङ्ग में विशेष प्रत्यय के लिए है और डित् का प्रयोजन टेः से टिलोप है। एक का पूरण अर्थात् पहली संख्या को पूर्ण करने वाला(पहला) प्रथम, दो का पूरण द्वितीय, पाँच का पूरण पञ्चम आदि समझना चाहिए।

एकादशः। ग्यारहवीं संख्या को पूर्ण करने वाला, ग्यारहवाँ। एकादशानां पूरणः लौकिक विग्रह और एकादशन् आम् अलौकिक विग्रह है। तस्य पूरणे डट् से डट्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके एकादशन्+अ बना। इसमें अन् टि है, उसका टेः से लोप हुआ, एकादश्+अ=एकादश बना। सु, रुत्वविसर्ग करके एकादशः सिद्ध हुआ। इसी प्रकार बारहवीं संख्या का पूरण अर्थ में द्वादशः आदि बनाइये।