उभशब्दात्तयपोऽयच् स्यात्, स चाद्युदात्तः। उभयम्।
लौकिक विग्रह और पञ्चन् जस् अलौकिक विग्रह है। सङ्ख्याया अवयवे तयप् से तयप्प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप करके पञ्चतय बना। सु, अम् और पूर्वरूप करके पञ्चतयम् सिद्ध हुआ। इसी तरह षट्तयम्, अष्टतयम्, नवतयम् आदि भी बनाइये।
११७४- उभादुदात्तो नित्यम्। उभात् पञ्चम्यन्तम्, उदात्तः प्रथमान्तं, नित्यं द्वितीयान्तं क्रियाविशेषणम्। द्वित्रिभ्यां तयस्यायन्वा से तयस्य और अयच् की अनुवृत्ति आती है।
‘उभ’ इस प्रातिपदिक से परे तयप् के स्थान पर नित्य से अयच् आदेश होता है और वह उदात्त स्वर वाला होता है।
अष्टाध्यायी के अनेक सूत्र प्रत्यय आदि का विधान करते हुए स्वर का भी विधान करते हैं, उसमें से एक सूत्र यह भी है।
उभयम्। दोनों अवयव हैं इसके अर्थात् दो अवयव वाला अवयवी। उभौ