Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 55
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VṛttiGovind
LSK 1173
अयजादेशविधायकं विधिसूत्रम्
द्वित्रिभ्यां तयस्यायज्वा
Aṣṭādhyāyī 5.2.43
Vṛtti Varadarājācārya

द्वयम्, द्वितयम्। त्रयम्, त्रितयम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११७३- द्वित्रिभ्यां तयस्यायन्वा। द्विश्च त्रिश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वो द्वित्री, ताभ्याम्। द्वित्रिभ्यां पञ्चम्यन्तं, तयस्य पष्ठ्यन्तम्, अयच् प्रथमान्तं, वा अव्ययपदम् अनेकपदमिदं सूत्रम्।

द्वि और त्रि प्रातिपदिकों से परे तयप् के स्थान पर वैकल्पिक अयच् आदेश होता है।

चकार इत्संज्ञक है। स्थानिवद्भावेन तयप् में विद्यमान गुण प्रत्ययत्व आदि अयच् में भी आ जाते हैं।

द्वयम्, द्वितयम्। दो अवयव या संख्या है जिसकी, वह। द्वौ अवयवौ अस्य लौकिक विग्रह और द्वि औ अलौकिक विग्रह है। सङ्ख्याया अवयवे तयप् से तयप्प्रत्यय, अनुबन्धलोप, द्वित्रिभ्यां तयस्यायन्वा से तय के स्थान पर अयच् आदेश, अनुबन्धलोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करने पर द्वि+अय बना। भसंज्ञक इकार का लोप करने पर द्व+अय=द्वय बना, सु, अम् करके द्वयम् सिद्ध हुआ। अयजादेश न होने के पक्ष में द्वितयम् बना।

त्रयम्, त्रितयम्। तीन अवयव या संख्या है जिसकी, वह। त्रयः अवयवाः अस्य लौकिक विग्रह और त्रि जस् अलौकिक विग्रह है। सङ्ख्याया अवयवे तयप् से तयप्प्रत्यय, अनुबन्धलोप, द्वित्रिभ्यां तयस्यायन्वा से तय के स्थान पर अयच् आदेश, अनुबन्धलोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करने पर त्रि+अय बना। भसंज्ञक इकार का लोप करने पर त्र+अय=त्रय बना, सु, अम् करके त्रयम् सिद्ध हुआ। अयजादेश न होने के पक्ष में त्रितयम् बना।