Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 55
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VṛttiGovind
LSK 1171
ईश्+कि+इत्यादेशविधायकं विधिसूत्रम्
कारनाम्नि च प्राचां हलादौ
Aṣṭādhyāyī 6.3.10
Vṛtti Varadarājācārya

दृग्दृश्वतुषु इदम् ईश्, किमः किः। कियान्। इयान्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११७१- इदंकिमोरीश्की। इदं च किम् च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्व इदंकिमौ, तयोः। ईश् च किश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्व ईश्की। दृग्दृश्वतुषु से दृग्दृश्वतुषु की अनुवृत्ति आती है।

दृक्, दृश्, वतुप् के परे रहने पर इदम् शब्द के स्थान पर ईश् और किम् शब्द के स्थान पर कि आदेश होते हैं।

यथासङ्ख्य होने से इदम् के स्थान पर ईश् और किम् के स्थान कि आदेश होते हैं। ईश् यह आदेश शित् है, अतः इदम् सम्पूर्ण के स्थान पर आदेश होता है।

कियान्। क्या है परिमाण इसका? अर्थात् कितना। किं परिमाणमस्य, यह लौकिक विग्रह है। किम् सु इस अलौकिक विग्रह में किमिदम्भ्यां वो घः से वतुप् प्रत्यय और वकार के स्थान पर घ् आदेश हुआ, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके किम्+घ्+अत् बना है। घ् के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से इय् आदेश होकर किम्+इयत् बना। अब किम् के स्थान पर इदंकिमोरीश्की से कि आदेश होकर कि+इयत् बना। यस्येति च से कि के इकार का लोप हुआ- क्+इयत् बना। वर्णसम्मेलन होकर कियत् बना। इससे सु, उपधा को दीर्घ, नुम्, हल्ड्यादिलोप और संयोगान्तलोप होकर कियान् और आगे कियन्तौ, कियन्तः आदि रूप बनते हैं।

इयान्। यह है परिमाण इसका, अर्थात् इतना। इदं परिमाणमस्य, यह लौकिक विग्रह है। इदम् सु इस अलौकिक विग्रह में किमिदम्भ्यां वो घः से वतुप् प्रत्यय और वकार के स्थान पर घ् आदेश हुआ, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके इदम्+घ्+अत् बना है। घ् के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से इय् आदेश होकर इदम्+इयत् बना। अब इदम् के स्थान पर इदंकिमोरीश्की से ईश् सर्वादेश, शकार का लोप करके ई+इयत् बना। यस्येति च से अकेले ईकार का लोप हुआ- इयत् इतना मात्र प्रातिपदिक बना। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मान कर इससे सु, उपधा को दीर्घ, नुम्, हल्ड्यादिलोप और संयोगान्तलोप होकर इयान्, इयन्तौ, इयन्तः आदि रूप बनते हैं।