तारकाः सञ्जाता अस्य तारकितं नभः। पण्डितः। आकृतिगणोऽयम्।
११६७- तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतच्। तद् प्रथमान्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकम्, अस्य षष्ठ्यन्तं, सञ्जातं प्रथमान्तं, तारकादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, इतच् प्रथमान्तम् अनेकपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ रहा है।
प्रथमान्त तारकादि गणपठित प्रातिपदिकों से 'तत्सञ्जातमस्य' अर्थात् 'वह हो गया है, इसका' इस अर्थ में इतच् प्रत्यय होता है।
तारकादि एक पाणिनि जी द्वारा पढ़ा गया गणपाठ है, इसमें कुछ शब्द तो उनके द्वारा पठित हैं, शेष शब्दों को आकृतिगण मानकर इसके अन्तर्गत मान लिया जाता है, जिससे इतच् प्रत्यय हो जाय। चकार इत्संज्ञक है, इत बचता है। अजादि होने के कारण इसके परे होने पर भसंज्ञा होती है और जित्, णित्, कित् न होने के कारण आदिवृद्धि नहीं होती है।
तारकितं नभः। तारे हो गये हैं जिसके, ऐसा आकाश अर्थात् जैसे-जैसे रात्री का आगमन होता है वैसे-वैसे आकाश में तारे दिखते हैं तो वहाँ यह व्यवहार होता है कि आकाश तारामय हो गया है। तारकाः संजाताः अस्य लौकिक विग्रह और तारका जस् अलौकिक विग्रह में तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतच् से इतच् प्रत्यय हुआ, अनुबन्ध लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, भसंज्ञक आकार का लोप करके तारक्+इत=तारकित, सु, अम् और पूर्वरूप करके तारकितम् सिद्ध हुआ।
सदसद्विवेकिनी बुद्धिः पण्डा, सा सञ्जाता अस्य सः पण्डितः। सत् और असत् का विवेक करने वाली बुद्धि को पण्डा कहते हैं, इस प्रकार की बुद्धि जिसकी हो गई है, उसे पण्डित कहते हैं अर्थात् इतच् प्रत्यय होकर के पण्डितः की सिद्धि होती है।
पण्डितः। पण्डा संजाता अस्य लौकिक विग्रह और पण्डा सु अलौकिक विग्रह में तदस्य सञ्जातं तारकादिभ्य इतच् से इतच् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, भसंज्ञक आकार का लोप करके पण्ड्+इत=पण्डित, सु, रुत्वविसर्ग करके पण्डितः सिद्ध हुआ।
इसी प्रकार आगे भी बनाइये-
कुसुमानि सञ्जातानि अस्याः- कुसुमिता लता= पुष्प हो गये हैं जिस लता में।
बुभुक्षा सञ्जाता अस्य- बुभुक्षितो बालः= भूख हो गई जिस बालक में।
पिपासा सञ्जाता अस्य- पिपासितो जनः= प्यास लगी जिस मनुष्य को।
रोमाञ्चः सञ्जातोऽस्य- रोमाञ्चितो देहः= रोमाञ्च हो गया है जिस शरीर में।
गर्वः सञ्जातोऽस्य- गर्वितो जनः= घमण्ड हो गया है जिस मनुष्य को।