Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 55
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VṛttiGovind
LSK 1166
निपातनार्थं विधिसूत्रम्
हैयंगवीनं संज्ञायाम्
Aṣṭādhyāyī 5.2.23
Vṛtti Varadarājācārya

ह्योगोदोह-शब्दस्य हियङ्गुरादेशो विकारार्थे खञ्च निपात्यते।

दुह्यत इति दोहः क्षीरम्। ह्योगोदोहस्य विकारो हैयङ्गवीनं नवनीतम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११६६- हैयङ्गवीनं सञ्ज्ञायाम्। हैयङ्गवीनं प्रथमान्तं, संज्ञायां सप्तम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्।

विकार अर्थ में 'ह्योगोदोह' शब्द के स्थान पर 'हियङ्गु' आदेश और उसके संनियोग में खञ् प्रत्यय का निपातन होता है।

ह्योगोदोहः अर्थात् ह्यस्=कल के गोदोहः=गाय का दूध। दुह्यते इति दोहः, जिसका दोहन होता है, वह दोह है। दूध ही दोह है। उसके विकार अर्थात् कल के दूध से दही और उससे निर्मित ताजा-ताजा मक्खन अर्थ में इस सूत्र से ह्योगोदोह शब्द के स्थान पर हियङ्गु आदेश और साथ में खञ् प्रत्यय का भी निपातन सूत्रकार ने किया है। तात्पर्य यह है कि हैयङ्गवीनम् बनाने के लिए प्रक्रिया न दिखाकर सूत्र में ही सिद्ध प्रयोग का पठन सूत्रकार ने किया है। अब इसकी सिद्धि में जो भी प्रत्यय और ह्योगोदोह प्रकृति के स्थान पर जो भी आदेश अभीष्ट हो, वह करने के लिए हम स्वतन्त्र हैं। अब पाणिनि जी के द्वारा निपातित हैयङ्गवीन के बनाने में ह्योगोदोह के स्थान पर हियङ्गु आदेश और उसके साथ खञ् प्रत्यय का होना सम्भव है। इस तरह ह्यो-गोदोहस्य विकारः में उक्त कार्य करके

हियङ्गु+ख बना। आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से खकार के स्थान पर ईन् आदेश होकर हियङ्गु+ईन बना। आदिवृद्धि करके हैयङ्गु+ईन बना। उकार को ओर्गुणः से गुण होकर अवादेश करने पर हैयङ्ग्वीन बना। स्वादिकार्य करके हैयङ्ग्वीनम् सिद्ध हुआ।