व्रैहेयम्। शालेयम्।
अब भवनाद्यर्थक प्रत्ययों का प्रकरण आरम्भ होता है। इसके साथ में वह ऐसा हुआ, अवयव, पूरण आदि अर्थों में भी प्रत्यय होंगे। ये प्रत्यय खज्, इतच्, तयप्, डट्, तीय आदि हैं।
११६५- व्रीहिशाल्योर्ढक्। व्रीहिश्च शालिश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वो व्रीहिशाली, तयोः। व्रीहिशाल्योः पञ्चम्यर्थे षष्ठी, ढक् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् से भवने क्षेत्रे की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ङ्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार पूर्ववत् आ ही रहा है।
षष्ठ्यन्त व्रीहि और शालि इन प्रातिपदिकों से उनके उत्पत्तिस्थान क्षेत्र अर्थ में ढक् प्रत्यय होता है।
यह सूत्र धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् का अपवाद है। ककार इत्संज्ञक है, ढकार के स्थान पर एय् आदेश होता है।
व्रैहेयम्। धान के होने का क्षेत्र, खेत आदि। व्रीहीणां भवनं क्षेत्रम् लौकिक विग्रह और व्रीहि+आम् अलौकिक विग्रह है। ऐसी स्थिति में धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् से खञ् प्रत्यय प्राप्त हुआ, उसे बाधकर व्रीहिशाल्योर्ढक् से ढक् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से ढकार के स्थान पर एय् आदेश, आदिवृद्धि, भसंज्ञक इकार का लोप करके व्रैह्+एय=व्रैहेय बना। सु, अम्, पूर्वरूप करके व्रैहेयम् सिद्ध हुआ।
शालेयम्। शालि धान्यविशेष के होने का क्षेत्र, खेत आदि। शालीनां भवनं क्षेत्रम् लौकिक विग्रह और व्रीहि+आम् अलौकिक विग्रह है। ऐसी स्थिति में धान्यानां भवने क्षेत्रे खञ् से खञ् प्रत्यय प्राप्त हुआ, उसे बाधकर व्रीहिशाल्योर्ढक् से ढक् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से ढकार के स्थान पर एय् आदेश, आदिवृद्धि, भसंज्ञक इकार का लोप करके शाल्+एय=शालेय बना। सु, अम्, पूर्वरूप करके शालेयम् सिद्ध हुआ।