Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 54
Show
VṛttiGovind
LSK 1163
यक्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक्
Aṣṭādhyāyī 5.1.128
Vṛtti Varadarājācārya

सैनापत्यम्। पौरोहित्यम्।

इति त्वतलोरधिकारः॥५४॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११६३- पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक्। पतिः अन्ते येषां पत्यन्तानि, पुरोहितः आदिर्येषां तानि पुरोहितादीनि। पत्यन्तानि च पुरोहितादीनि च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वः पत्यन्तपुरोहितादीनि, तेभ्यः। पत्यन्तपुरोहितादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, यक् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तस्य भावस्त्वतलौ से तस्य और भावः तथा गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च से कर्मणि की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, उद्याप्प्रतिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है ही।

पतिशब्द अन्त में हो या पुरोहितादि गण में पठित शब्द हो, ऐसे षष्ठ्यन्त प्रतिपदिक शब्द से यक् प्रत्यय होता है।

ककार इत्संज्ञक है। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि होती है।

सैनापत्यम्। सेनापति का भाव या कर्म। पति-शब्द अन्त में है। सेनापतेः भावः कर्म वा लौकिक विग्रह और सेनापति इस् अलौकिक विग्रह। पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक् से यक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रतिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके सेनापति+य बना। आदिवृद्धि और भसंज्ञक इकार के लोप होने पर सैनापत्+य=सैनापत्य बना। सु, अम् और पूर्वरूप करके सैनापत्यम् सिद्ध हुआ।

पौरोहित्यम्। पुरोहित का भाव या कर्म। पुरोहितादि गणपठित शब्द है। पुरोहितस्य भावः कर्म वा लौकिक विग्रह और पुरोहित इस् अलौकिक विग्रह। पत्यन्तपुरोहितादिभ्यो यक् से यक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रतिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पुरोहित+य बना। आदिवृद्धि और भसंज्ञक अकार के लोप होने पर पुरोहित्+य=पौरोहित्य बना। सु, अम् और पूर्वरूप करके पौरोहित्यम् सिद्ध हुआ।

अब हम लोग तद्धितप्रकरण के अन्त की ओर हैं। कुछ ही दिनों में लघुसिद्धान्तकौमुदी का अध्ययन पूर्ण होने वाला है। इसके बाद वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी प्रारम्भ करेंगे। पाणिनीयाष्टाध्यायी के सभी सूत्र वैयाकरणसिद्धान्तकौमुदी में लिए गए हैं। यदि अष्टाध्यायी के क्रम से सूत्र याद हों और प्रक्रिया सिद्धान्तकौमुदी की हो तो व्यक्ति शब्दशास्त्र का प्रकाण्ड विद्वान् हो सकता है। इसलिए बार-बार हम पहले अष्टाध्यायी रटने की सलाह देते हैं। प्रति महीने एक अध्याय के हिसाब से आवृत्ति करने पर विना रटे ही पूरी अष्टाध्यायी याद हो सकती है।

परीक्षा

इस प्रकरण के सभी सूत्रों एवं उनके अर्थों पर प्रकाश डालते हुए किन्हीं दस प्रयोगों की सिद्धि दिखाइये।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या में

त्वतलोरधिकार-प्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ भवनाद्यर्थकाः