Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 54
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VṛttiGovind
LSK 1162
ढक्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
कपिज्ञात्योर्ढक्
Aṣṭādhyāyī 5.1.127
Vṛtti Varadarājācārya

कापेयम्। ज्ञातेयम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११६२- कपिज्ञात्योर्ढक्। कपिश्च ज्ञातिश्च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः कपिज्ञाती, तयोः। कपिज्ञात्योः पञ्चम्यर्थे षष्ठी। ढक् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तस्य भावस्त्वतलौ से तस्य भावः, गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च से कर्मणि की अनुवृत्ति और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ रहा है।

षष्ठ्यन्त कपि और ज्ञाति प्रातिपदिको से ढक् प्रत्यय होता है।

ककार की इत्संज्ञा होने से आदिवृद्धि होती है। ढ में केवल ढ् के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से एय् आदेश होकर एय बन जाता है।

कापेयम्। कपि=बन्दर का भाव या बन्दर का कर्म। कपेर्भावः कर्म वा। कपि डन्स् में कपिज्ञात्योर्ढक् से ढक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुब्लुक् करके ढकार के स्थान पर एय् आदेश होकर कपि+एय बना है। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि करके कपि+एय बना। भसंज्ञक इकार का यस्येति च से लोप करके कापेय बन गया है। इससे स्वादिकार्य करने पर कापेयम् सिद्ध हो जाता है।

ज्ञातेयम्। ज्ञाति अर्थात् बन्धु का का भाव, या बन्धु का कर्म। ज्ञातेर्भावः कर्म वा। डन्स् में कपिज्ञात्योर्ढक् से ढक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् लुक् करके ढकार के स्थान पर एय् आदेश होकर ज्ञाति+एय बना है। कित् होने के कारण पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्तिः इस न्याय से वृद्धिवर्ण के स्थान पर भी किति च से आदिवृद्धि करके ज्ञाति+एय बना। भसंज्ञक इकार का यस्येति च से लोप करके ज्ञातेय बन गया है। इससे स्वादिकार्य करने पर ज्ञातेयम् सिद्ध हो जाता है।