Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 54
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VṛttiGovind
LSK 1161
य-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
सख्युर्यः
Aṣṭādhyāyī 5.1.126
Vṛtti Varadarājācārya

सख्युर्भावः कर्म वा सख्यम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११६१- सख्युर्यः। सख्युः पञ्चम्यन्तं, यः प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। इस सूत्र में तस्य भावस्त्वतलौ से तस्य, भावः तथा गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च से कर्मणि की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है ही।

षष्ठ्यन्त सखि इस प्रातिपदिक से भाव और कर्म अर्थ में य प्रत्यय होता है।

सख्यम्। मित्रभाव, मैत्री, मित्रता या मित्र का कर्म। सख्युर्भावः कर्म वा लौकिक विग्रह और सखि डन्स् अलौकिक विग्रह। सख्युर्य से य प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके सखि+य बना। भसंज्ञक इकार का लोप होने पर सख्+य=सख्य बना। सु, अम् और पूर्वरूप करके सख्यम् सिद्ध हुआ।