Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 54
Show
VṛttiGovind
LSK 1160
ष्यञ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च
Aṣṭādhyāyī 5.1.124
Vṛtti Varadarājācārya

चाद्भावे। जडस्य भावः कर्म वा जाड्यम्। मूढस्य भावः कर्म वा

मौढ्यम्। ब्राह्मण्यम्। आकृतिगणोऽयम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११६०- गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च। गुणम् उक्तवन्तः इति गुणवचनाः। ब्राह्मणः आदिर्येषां ते ब्राह्मणादयः। गुणवचनाश्च ब्राह्मणादयश्च तेषामितरेतरयागद्वन्द्वो गुणवचनब्राह्मणादयस्तेभ्यः। गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, कर्मणि सप्तम्यन्तं, चाव्ययपदं त्रिपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तस्य भावस्त्वतलौ से तस्य, भावः तथा वर्णदृढादिभ्यः ष्यञ् च से ष्यञ् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्य्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है ही।

षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक गुणवाचक शब्द या ब्राह्मणादिगणपठित शब्दों से भाव और कर्म अर्थ में ष्यञ् प्रत्यय होता है।

षकार की षः प्रत्ययस्य से इत्संज्ञा होती है तो जकार हलन्त्यम् से इत्संज्ञक है। य शेष रहता है। जित् होने के कारण आदिवृद्धि भी होती है। इसके पहले के सूत्रों से भाव अर्थ में ही प्रत्यय हो रहे थे तो इसमें कर्म अर्थ भी जुड़ गया है। ब्राह्मणादि आकृतिगण है।

जाड्यम्। जड़ता का भाव या जड़ का कर्म। जडस्य भावः कर्म वा लौकिक विग्रह और जड डस् अलौकिक विग्रह है। गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च से ष्यञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके जड+य बना। आदिवृद्धि और भसंज्ञक अकार का लोप होने पर जाड्+य=जाड्य बना। सु, अम् और पूर्वरूप करके जाड्यम् सिद्ध हुआ।

मौढ्यम्। मूढ होने का भाव या मूढ का कर्म, मूढपन। मूढस्य भावः कर्म वा लौकिक विग्रह और मूढ डस् अलौकिक विग्रह है। गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च से ष्यञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके मूढ+य बना। आदिवृद्धि और भसंज्ञक अकार का लोप होने पर मौढ्+य=मौढ्य बना। सु, अम् और पूर्वरूप करके मौढ्यम् सिद्ध हुआ।

ब्राह्मण्यम्। ब्राह्मण का भाव या कर्म। ब्राह्मणस्य भावः कर्म वा लौकिक विग्रह और ब्राह्मण डस् अलौकिक विग्रह है। गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च से ष्यञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके ब्राह्मण+य बना। आदिवृद्धि और भसंज्ञक अकार का लोप होने पर ब्राह्मण्+य=ब्राह्मण्य बना। सु, अम् और पूर्वरूप करके ब्राह्मण्यम् सिद्ध हुआ।

इसी तरह चोरस्य भावः कर्म वा चौर्यम्, निपुणस्य भावः कर्म वा नैपुण्यम्, दीनस्य भावः कर्म वा दैन्यम्, चपलस्य भावः कर्म वा चापल्यम्, विषमस्य भावः कर्म वा वैषम्यम् आदि बनाये जा सकते हैं।