Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 54
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VṛttiGovind
LSK 1159
व्यञ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
वर्णदृढादिभ्यः ष्यञ् च
Aṣṭādhyāyī 5.1.123
Vṛtti Varadarājācārya

चादिमनिच्। शौक्ल्यम्। शुक्लिमा। दार्ढ्यम्। द्रढिमा।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११५९- वर्णदृढादिभ्यः व्यञ्च। दृढ आदिर्येषां ते दृढादयः। वर्णाश्च दृढादयश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो वर्णदृढादयस्तेभ्यः। वर्णदृढादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, व्यञ् प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदं सूत्रम्। तस्य भावस्त्वतलौ से तस्य भावः की अनुवृत्ति आती है और सूत्र में पठित च से पिछले सूत्र पृथ्वादिभ्य इमनिन्वा के इमनिच् का ग्रहण हो जाता है। प्रत्ययः, परश्च, उच्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है ही।

वर्ण अर्थात् रंगवाचक एवं दृढादिगणपठित षष्ठ्यन्तप्रातिपदिकों से भाव अर्थ में व्यञ् प्रत्यय होता है और इमनिच् प्रत्यय भी होता है।

षः प्रत्ययस्य से षकार की इत्संज्ञा होती है। हलन्त्यम् से ञकार इत्संज्ञक है। य बचता है। षित् होने से स्त्रीत्व की विवक्षा में षिद्गौरादिभ्यश्च से उन्नीष् होता है। ञित् का फल आदिवृद्धि है।

शौक्ल्यम्। शुक्लिमा। सफेद का भाव, सफेदी। शुक्लस्य भावः। यह वर्णवाचक है। शुक्ल उन्मू में वर्णदृढादिभ्यः व्यञ् च से व्यञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके शुक्ल+य बना। ञित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करके शौक्ल+य बना। यस्येति च से भसंज्ञक अकार के लोप के बाद शौक्ल+य= शौक्ल्य बना। अब स्वादिकार्य करके शौक्ल्यम् सिद्ध हुआ। इमनिच् प्रत्यय होने के पक्ष में शुक्ल+इमन् बना है। टेः से टिसंज्ञक अकार के लोप करने पर शुक्लिमन् बना। इससे राजन् शब्द की तरह शुक्लिमा, शुक्लिमानौ, शुक्लिमानः आदि रूप बना सकते हैं। आ च त्वात् के अधिकार के कारण त्व, तल् प्रत्यय भी होंगे। त्व के योग में शुक्लत्वम् और तल् के योग में शुक्लता भी बन जाते हैं।

इसी तरह कृष्णस्य भावः- काष्णर्यम्, कृष्णिमा, कृष्णत्वम्, कृष्णता आदि सभी वर्णवाचक शब्दों से ये प्रत्यय किये जा सकते हैं।

दार्ढ्यम्। द्रढिमा। दृढता का भाव, दृढभाव, दृढपन। दृढस्य भावः। यह दृढादिगणपठित शब्द है। दृढ उन्मू में वर्णदृढादिभ्यः व्यञ् च से व्यञ् प्रत्यय, अनुबन्ध लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके दृढ+य बना। ञित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि करके दार्ढ+य बना। यस्येति च से भसंज्ञक अकार के लोप के बाद दार्ढ्य+य= दार्ढ्य बना। अब स्वादिकार्य करके दार्ढ्यम् सिद्ध हुआ। इमनिच् प्रत्यय होने के पक्ष में दृढ+इमन् बना है। र ऋतो हलादेर्लघोः से दृढ के ऋकार के स्थान पर र आदेश होकर द्रढ+इमन् बना। टेः से टिसंज्ञक अकार के लोप करने पर द्रढिमन् बना। इससे राजन् शब्द की तरह द्रढिमा, द्रढिमानौ, द्रढिमानः आदि रूप बना सकते हैं। आ च त्वात् के अधिकार के कारण त्व, तल् प्रत्यय भी होंगे। त्व के योग में दृढत्वम् और तल् के योग में दृढता भी बन जाते हैं। इसी तरह दृढादिगणपठित सभी शब्दों से उक्त प्रत्यय करके प्रयोग बनाये जा सकते हैं।