Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 54
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VṛttiGovind
LSK 1158
अण्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
इगन्ताच्च लघुपूर्वात्
Aṣṭādhyāyī 5.1.131
Vṛtti Varadarājācārya

इगन्ताल्लघुपूर्वात् प्रातिपदिकाद्भावेऽण् प्रत्ययः। पार्थवम्। म्रदिमा, मार्दवम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११५८- इगन्ताच्च लघुपूर्वात्। इक् अन्तोऽन्तावयवो यस्य तद् इगन्तं, तस्मात्। लघुः पूर्वो यस्य तत् लघुपूर्वम्, तस्मात्। इगन्तात् पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, लघुपूर्वात् पञ्चम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। तस्य भावस्त्वतलौ से तस्य, भावः तथा गुणवचनब्राह्मणादिभ्यः कर्मणि च से कर्मणि एवं हायनान्तयुवादिभ्योऽण् से अण् की अनुवृत्ति आती है और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ रहा है।

लघुवर्ण जिसके पूर्व में और इक् जिस के अन्त में हो ऐसे षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक से भाव और कर्म अर्थों में तद्धितसंज्ञक अण् प्रत्यय होता है।

प्रथिमा, पार्थवम्, पृथुत्वम्, पृथुता। विस्तार का भाव, मोटापन, महत्ता। पृथोर्भावः। पृथु डस् में पृथ्वादिभ्य इमनिन्वा से विकल्प से इमनिच् प्रत्यय, अनुवन्ध लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पृथु+इमन् बना। र ऋतो हलादेर्लघोः से पृथु के ऋकार के स्थान पर र आदेश होकर प्+र=प्र, प्रथु+इमन् बना। टेः इस सूत्र से टिसंज्ञक प्रथु के उकार का लोप हुआ, प्रथु+इमन् बना। वर्णसम्मेलन होकर प्रथिमन् बना। इससे सु आदि प्रत्ययों के योग में राजन् शब्द की तरह उपधा को दीर्घ, हल्ड्यादिलोप, नकार का लोप करके प्रथिमा सिद्ध हो जाता है। इसके आगे के रूप राजन् की ही तरह प्रथिमानौ, प्रथिमानः, प्रथिमानम्, प्रमिमानौ, प्रथिम्नः आदि चलते हैं। इमनिच् प्रत्यय वैकल्पिक है, उसके न होने के पक्ष में इगन्ताच्च लघुपूर्वात् से अण् प्रत्यय होकर पृथु+अ बना। णित् होने के कारण आदिवृद्धि होकर पार्थु+अ बना। ओर्गुणः से गुण होकर ओकार और उसके स्थान पर अव् आदेश होकर पार्थव बना और स्वादिकार्य करके पार्थवम् सिद्ध हो जाता है। आ च त्वात् से त्व और तल् प्रत्ययों के अधिकृत होने के कारण त्व प्रत्यय के योग में पृथुत्वम् और तल् प्रत्यय के योग में पृथुता भी बन जाते हैं। इस तरह से चार रूप बने।

इसी तरह

मृदोर्भावः- म्रदिमा, मार्दवम्, मृदुत्वम्, मृदुता।

लघोर्भावः- लघिमा, लाघवम्, लघुत्वम्, लघुता।

गुरोर्भावः- गरिमा, गौरवम्, गुरुत्वम्, गुरुता।

ऋजोर्भावः- ऋजिमा, आर्जवम्, ऋजुत्वम्, ऋजुता।

अणोर्भावः- अणिमा, आणवम्, अणुत्वम्, अणुता।

महतो भावः- महिमा, महत्त्वम्, महत्ता आदि बनाये जा सकते हैं।