Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 54
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VṛttiGovind
LSK 1156
रेफादेशविधायकं विधिसूत्रम्
र ऋतो हलादेर्लघोः
Aṣṭādhyāyī 6.4.161
Vṛtti Varadarājācārya

हलादेर्लघोऋकारस्य रः स्यादिष्ठेयस्सु परतः।

पृथुमृदुभृशकृशदृढपरिवृढानामेव रत्वम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११५६- र ऋतो हलादेर्लघो:। रः प्रथमान्तं, ऋतः षष्ठ्यन्तं, हलादेः षष्ठ्यन्तं, लघोः षष्ठ्यन्तम्, अनेकपदं सूत्रम्। तुरिष्ठेमेयस्सु से इष्ठेमेयस्सु की अनुवृत्ति आती है और अङ्गस्य का अधिकार है।

हलादि अङ्ग के लघु ऋकार के स्थान पर र आदेश होता है इष्ठन्, इमनिच् और ईयसुन् प्रत्यय के परे होने पर।

र यह आदेश अकार सहित रेफ वाला है, केवल र् नहीं है। इष्ठेमेयस्सु यह सप्तम्यन्त पद है। इसमें गृहीत प्रत्यय अनुबन्धविनिर्मुक्त हैं। इष्ठन् में इष्ठ, इमनिच् से इमन् और ईयसुन् से इयस् बचा हुआ होता है। इष्ठश्च इमन् च ईयस् च में समास करके विभक्ति का लुक् करने के बाद इमन् के नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप करके इम ही बचता है। इस तरह इष्ठ+इम+ईयस् बना। दोनों जगह गुण करके इष्ठेमेयस् बना। इसके सप्तमी बहुवचन में इष्ठेमेयस्सु बनता है। उसकी अनुवृत्ति इस सूत्र में की गई है।

पृथ्वादिगण में अनेक शब्द आते हैं, उनमें से पृथुमृदुभृशकृशदृढपरिवृढानामेव रत्वम् अर्थात् पृथु, मृदु, भृश, कृश, दृढ और परिवृढ के ऋकार को ही र आदेश हो, अन्य पृथ्वादि शब्दों को न हो।