Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 54
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VṛttiGovind
LSK 1155
इमनिच्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा
Aṣṭādhyāyī 5.1.122
Vṛtti Varadarājācārya

वा-वचनमणादिसमावेशार्थम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११५५- पृथ्वादिभ्य इमनिन्वा। पृथु आदिर्येषां ते पृथ्वादयस्तेभ्यः। पृथ्वादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, इमनिच् प्रथमान्तं, वा अव्ययपदं, त्रिपदं सूत्रम्। तस्य भावस्त्वतलौ से तस्य और भावः की अनुवृत्ति आती है एवं प्रत्ययः, परश्च, उच्याप्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थाना प्रथमाद्वा का पूर्ववत् अधिकार है।

षष्ठ्यन्त समर्थ पृथु आदि प्रातिपदिकों से भाव अर्थ में इमनिच् प्रत्यय होता है।

इस सूत्र में पठित वा शब्द से पक्ष में अण् आदि प्रत्ययों का भी समावेश किया जाता है। अतः इमनिच् और अण् आदि दोनों प्रत्यय होंगे। इमनिच् में अन्त्य चकार और उससे पूर्ववर्ती इकार इत्संज्ञक हैं, इमन् बचता है।