ब्रह्मणस्त्व इत्यतः प्राक् त्वतलावधिक्रियेते। अपवादैः सह
समावेशार्थमिदम्। चकारो नञ्सनञ्भ्यामपि समावेशार्थः। स्त्रिया भावः स्त्रैणम्।
स्त्रीत्वम्। स्त्रीता। पौंस्नम्। पुंस्त्वम्। पुंस्ता।
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११५४- आ च त्वात्। आ अव्ययपदं, च अव्ययपदं, त्वात् पञ्चम्यन्तं, त्रिपदं सूत्रम्। तस्य भावस्त्वतलौ यह पूरा सूत्र अनुवृत्त होकर आता है। आ मर्यादायामव्ययम्।
‘ब्रह्मणस्त्वः’ से पहले ‘त्व’ और ‘तल्’ का अधिकार किया जाता है।
अष्टाध्यायी में ब्रह्मणस्त्वः५।१।१३६॥ यह सूत्र आगे पढ़ा गया है। उसके पहले तक त्व और तल् इन दो प्रत्ययों के अधिकार के लिए यह सूत्र पठित है।
अब इसमें यह प्रश्न उठता है कि यह काम तो तस्य भावस्त्वतलौ से भी हो सकता है? तो उत्तर में कहा अपवादैः सह समावेशार्थमिदम्। अर्थात् त्व और तल् प्रत्यय के बाधक इमनिच् आदि प्रत्यय जब हों तो इमनिच् आदि के साथ-साथ त्व, तल् भी हों, इसलिए अधिकार की आवश्यकता है।
अब दूसरा प्रश्न करते हैं कि आ च त्वात् में चकार किस लिए है? इसका उत्तर इस तरह से दिया है- चकारो नञ्सन्भ्यामपि समावेशार्थः। अर्थात् चकार से समुच्चय का अर्थज्ञान होता है। यहाँ पर चकार नञ्, स्नञ् प्रत्ययों का भी समावेश करने के लिए है। जैसे कि लोक में तुम भी आओ इस वाक्य के प्रयोग से यह ज्ञात होता है कि एक और किसी को भी आना है। इसी तरह इस सूत्र में पठित चकार से त्व, तल् के साथ नञ्, स्नञ् का भी बोध होता है। तात्पर्य यह हुआ कि त्व, तल् के बाधक इमनिच् आदि प्रत्ययों के साथ-साथ त्व, तल्, नञ्, स्नञ् ये प्रत्यय भी बारी-बारी से होंगे।
स्त्रैणः। स्त्री का भाव। स्त्रिया भावः लौकिक विग्रह है। स्त्री डस् में आ च त्वात् के अधिकार में पठित स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्सन्औ भवनात् से नञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके स्त्री+न बना। जित् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि होने पर ईकार के स्थान पर ऐकार हो गया, स्त्रै+न बना। अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि से प्रत्यय के नकार के स्थान पर णकार आदेश होकर स्त्रैण बना और विभक्तिकार्य करके स्त्रैणम् सिद्ध हुआ। त्व प्रत्यय होने के पक्ष में स्त्रीत्वम् और तल् प्रत्यय होने के पक्ष में तलन्तं स्त्रियाम् के नियम से तल् प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग में होता है। अतः अजाद्यतष्टाप् से टाप् प्रत्यय होकर स्त्रीता बन जाता है।
पौंस्नः। पुरुष का भाव। पुंसो भावः लौकिक विग्रह है। पुस् डस् में आ च त्वात् के अधिकार में पठित स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्सन्औ भवनात् से स्नञ् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके पुंस्+स्न बना। जित् हो . क कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदिवृद्धि होने पर उकार के स्थान पर औकार हो गया, पौंस्+स्न बना। विभक्ति के लुक्
हो जाने पर भी पूर्व विभक्ति को लेकर पदत्व मान कर संयोगान्त पौंस् के सकार का लोप करके पौंस्न बना और विभक्तिकार्य करके पौंस्नम् सिद्ध हुआ। त्व प्रत्यय होने के पक्ष में पुंस्त्वम् और तल् होने के पक्ष में पुंस्ता बन जाते हैं।