Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 54
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VṛttiGovind
LSK 1152
वति-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तत्र तस्येव
Aṣṭādhyāyī 5.1.116
Vṛtti Varadarājācārya

मथुरायामिव मथुरावत् स्रुग्धे प्राकाराः। चैत्रस्येव चैत्रवन्मैत्रस्य गावः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अब त्व और तल् प्रत्यय के अधिकार वाला प्रकरण प्रारम्भ होता है। इसके अन्तर्गत तुल्य और सदृश अर्थ में वति और भाव अर्थ में त्व आदि प्रत्ययों का विधान है।

११५२- तत्र तस्येव। तत्र सप्तम्यन्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, तस्य षष्ठ्यन्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकम्, इव अव्ययपदं त्रिपदमिदं सूत्रम्। तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः से वति की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ ही रहा है।

सप्तम्यन्त और षष्ठ्यन्त प्रातिपदिक से सदृश, समान आदि अर्थों में

वतिप्रत्यय होता है।

उसमें सदृश या उसके सदृश।

मथुरावत्। मथुरा के सदृश अर्थात् मथुरायाम् इव अयोध्यायां प्राकाराः मथुरा

की तरह हैं अयोध्या के महल, परकोटे। मथुरायाम् इव लौकिक विग्रह और मथुरा डि

अलौकिक विग्रह है। तत्र तस्येव से वतिप्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा और सुप् का

लुक् करके मथुरावत् बना। अव्यय होने के कारण आई हुई विभक्ति का लुक्, मथुरावत्।