Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 53
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VṛttiGovind
LSK 1150
ठञ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तेन निर्वृत्तम्
Aṣṭādhyāyī 5.1.79
Vṛtti Varadarājācārya

अह्ना निर्वृत्तम्- आह्निकम्।

इति ठञोऽवधिः॥५३॥

(प्राग्वतीयाः)

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११५०- तेन निर्वृत्तम्। तेन तृतीयान्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, निर्वृत्तं प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ ही रहा है।

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तृतीयान्त कालवाचक प्रातिपदिक से 'निर्वृत्त' अर्थात् बनाया गया, सम्पन्न किया गया आदि अर्थों में ठञ् प्रत्यय होता है।

आह्निकम्। एक दिन में बनाया गया या एक दिन में पूरा किया गया। अह्ना निर्वृत्तम् लौकिक विग्रह और अहन् टा अलौकिक विग्रह है। तेन निर्वृत्तम् से ठञ्, अनुबन्ध का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, विभक्ति का लुक् और ठ के स्थान पर इक आदेश करके अहन्+इक बना। आदिवृद्धि करके अल्लोपोऽनः से भसंज्ञक अन् के अकार का लोप करके आहन्+इक=आह्निक बना और स्वादिकार्य करके आह्निकम् सिद्ध हुआ। इसी तरह मासिकम्, सांवत्सरिकम्, साप्ताहिकम्, पाक्षिकम् आदि भी बनाये जा सकते हैं।

परीक्षा

इस प्रकरण के सूत्रों एवं उनके अर्थों पर प्रकाश डालते हुए किन्हीं पाँच प्रयोगों की सिद्धि दिखाइये।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

ठञधिकार-प्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ त्वतलोरधिकारः