एभ्यो यत् स्यात्। दण्डमर्हति दण्ड्यः। अर्घ्यः। वध्यः।
११४९- दण्डादिभ्यो यत्। दण्डः आदिर्येषां ते दण्डादयस्तेभ्यः। दण्डादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, यत् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तदर्हति पूरा सूत्र अनुवृत्त होता है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ ही रहा है।
दण्ड आदि गणपठित द्वितीयान्त प्रातिपदिक से तदर्हति अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।
दण्ड्यः। दण्ड पाने योग्य। दण्डम् अर्हति लौकिक विग्रह और दण्ड अम् अलौकिक विग्रह है। दण्डादिभ्यो यत् से यत्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् और भसंज्ञक अकार का लोप करके दण्ड्+य=दण्ड्य बना। उसके बाद रुत्व और विसर्ग करके दण्ड्यः सिद्ध हुआ।
अर्घ्यः। अर्घ पाने योग्य। अर्घम् अर्हति लौकिक विग्रह और अर्घ अम् अलौकिक विग्रह है। दण्डादिभ्यो यत् से यत्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् और भसंज्ञक अकार का लोप करके अर्घ्+य=अर्घ्य बना। उसके बाद रुत्व और विसर्ग करके अर्घ्यः सिद्ध हुआ।
वध्यः। वध करने योग्य। वधम् अर्हति लौकिक विग्रह और वध अम् अलौकिक विग्रह है। दण्डादिभ्यो यत् से यत्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् और भसंज्ञक अकार का लोप करके वध्+य=वध्य बना। उसके बाद रुत्व और विसर्ग करके वध्यः सिद्ध हुआ।