‘लब्धुं योग्यो भवति’ इत्यर्थे द्वितीयान्तात् ठजादयः स्युः।
श्वेतच्छत्रमर्हति श्वेतच्छत्रिकः।
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११४८- तदर्हति। तद् द्वितीयान्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकम्, अर्हति क्रियापदं द्विपदमिदं सूत्रम्।
तद्धिताः, ड्याप्यातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार
है।
यह व्यक्ति ‘उस वस्तु को प्राप्त करने योग्य है’ इस अर्थ में द्वितीयान्त
प्रातिपदिकों से ठज् आदि प्रत्यय होते हैं।
श्वेतच्छत्रिकः। सफेद छत्री प्राप्त करने योग्य। प्राचीन काल में योग्य विद्वान् और
राजा आदि के सम्मान में छत्र, चँवर आदि प्रदान करते थे और आज धर्माचार्यों में भी यह
प्रथा है। श्वेतच्छत्रम् अर्हति लौकिक विग्रह और श्वेतच्छत्र अम् यह अलौकिक विग्रह है। तदर्हति से ठञ्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, ठस्येकः से इक आदेश, तद्धितेष्वचामादेः से आदि अच् की वृद्धि, भसंज्ञक अकार का लोप करके श्वेतच्छत्र+इक=श्वेतच्छत्रिक बना। सु, रुत्वविसर्ग होकर श्वेतच्छत्रिकः सिद्ध हुआ।
चामरिकः। चँवर प्राप्त करने योग्य। चमरम् अर्हति लौकिक विग्रह और चमर अम् यह अलौकिक विग्रह है। तदर्हति से ठञ्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, ठस्येकः से इक आदेश, तद्धितेष्वचामादेः से आदि अच् की वृद्धि, भसंज्ञक अकार का लोप करके चामर+इक=चामरिक बना। सु, रुत्वविसर्ग होकर चामरिकः सिद्ध हुआ।