एते रूढशब्दा निपात्यन्ते।
११४७- पङ्क्ति-विंशति-त्रिंशच्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्षष्टिसप्तत्यशीतिनवतिशतम्। पङ्क्तिश्च
विंशतिश्च त्रिंशच्च चत्वारिंशच्च पञ्चाशच्च षष्टिश्च सप्ततिश्च अशीतिश्च नवतिश्च
शतञ्च तेषां समाहारद्वन्द्वः पङ्क्ति-विंशति-त्रिंशच्चत्वारिंशत्पञ्चाशत्षष्टिसप्तत्यशीतिनवतिशतम्।
समाहारद्वन्द्वात्मकं प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्।
पङ्क्ति, विंशति, त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चाशत्, षष्टि, सप्तति, अशीति,
नवति और शतम् इन रूढ-शब्दों का निपातन होता है।
पाणिनि जी ने इन शब्दों में प्रकृति और प्रत्यय की कल्पना न करके सीधे ही
उच्चारण कर इन शब्दों का अनुशासन किया है। प्रकृति और प्रत्यय न दिखाकर सीधे शब्दों
को दिखाने को ही निपातन कहते हैं। अब इसमें हम चाहें तो अनुरूप प्रकृति और प्रत्यय
लगा सकते हैं अथवा पाणिनि जी द्वारा ये दस शब्द तद्धितान्त के रूप में स्वयं सिद्ध हैं,
इनकी प्रक्रिया के चक्कर में न पड़कर इनको साधु अर्थात् शुद्ध मानकर प्रक्रिया के विना
ही काम चलाने में भी कोई आपत्ति नहीं है। यहाँ लघुसिद्धान्तकौमुदी में हम भी प्रक्रिया
की ओर न जाकर उपर्युक्त दस शब्दों को तद्धितसिद्ध मान लेते हैं और केवल सु आदि
प्रत्ययों की ही प्रक्रिया करते हैं। जैसे पाणिनि जी द्वारा निपातित पङ्क्ति, विंशति, षष्टि,
सप्तति, अशीति, नवति से सु रुत्वविसर्ग करके पङ्क्तिः, विंशतिः, षष्टिः, सप्ततिः,
अशीतिः, नवतिः बन गये। शत से सु, अम्, शतम्। शेष त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चाशत्
से सु और हलन्त होने से हल्ड्याब्ध्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से सु का लोप करके
त्रिंशत्, चत्वारिंशत्, पञ्चाशत् ही सिद्ध होते हैं।