सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणञौ स्तः।
अनुशतिकादीनाञ्च। सर्वभूमेरीश्वरः सार्वभौमः। पार्थिवः।
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११४६- तस्येश्वरः। तस्य षष्ठ्यन्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकम्, ईश्वरः प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणञौ यह पूरा सूत्र अनुवृत्त होता है और तद्धिताः, उच्चाप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार है।
सर्वभूमि और पृथिवी इन षष्ठ्यन्त प्रातिपदिकों से से 'ईश्वर' अर्थात् स्वामी अर्थ में अण् और अञ् प्रत्यय होते हैं।
सर्वभूमि और पृथिवी ये दो प्रकृति हैं और अण् और अञ् ये दो प्रत्यय हैं। यथासंख्य होने से सर्वभूमि से अण् और पृथिवी से अञ् होते हैं। णकार और ञकार इत्संज्ञक हैं तो दोनों में अकार ही शेष बचता है। णित् का फल स्वर में अन्तोदात्त औ ञित् का फल आदि उदात्त करना है। यह बात पहले भी बताई जा चुकी है।
सार्वभौमः। सम्पूर्ण भूमि का स्वामी। सर्वभूमेः ईश्वरः लौकिक विग्रह और सर्वभूमि उत्स् यह अलौकिक विग्रह है। तस्येश्वरः से अण्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, तद्धितेष्वचामादेः से आदि अच् की वृद्धि प्राप्त थी, उसे बाधकर अनुशतिकादीनाञ्च से सर्व और भूमि दोनों पदों में विद्यमान आदि अच् अकार और ऊकार की वृद्धि होकर क्रमशः सार्व+भौम=सार्वभौम+अ बना। भसंज्ञक मकारोत्तरवर्ती अकार का लोप हुआ- सार्वभौम्+अ=सार्वभौम बना। सु, रुत्वविसर्ग होकर सार्वभौमः सिद्ध हुआ।
पार्थिवः। पृथिवी का स्वामी। पृथिव्याः ईश्वरः लौकिक विग्रह और पृथिवी उत्स् यह अलौकिक विग्रह है। तस्येश्वरः से अण्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, एक ही अच् होने के कारण तद्धितेष्वचामादेः से आदि अच् की वृद्धि करने पर ऋकार के स्थान
पर आर्, भसंज्ञक ईकार का लोप, पार्थिव्+अ=पार्थिव बना। सु, रुत्वविसर्ग होकर पार्थिवः
सिद्ध हुआ।