Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 53
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Govind
LSK 1145
अणञ्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणञौ
Aṣṭādhyāyī 5.1.41
Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११४५- सर्वभूमिपृथिवीभ्यामणञौ। सर्वा चासौ भूमिः सर्वभूमिः। सर्वभूमिश्च पृथिवी च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वः सर्वभूमिपृथिव्यौ, ताभ्याम्। अण् च अञ् च अणञौ। सर्वभूमिपृथिवीभ्यां पञ्चम्यन्तम्, अणञौ प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्।

सर्वभूमि और पृथिवी शब्दों से प्राक्क्रीतीय अर्थों में क्रमशः अण् और अञ् प्रत्यय होते हैं।

क्रमशः णकार और ञकार इत्संज्ञक हैं, दोनों में अ ही शेष रहता है। अण् प्रत्ययान्त अन्तोदात्त और अञ् प्रत्ययान्त आद्युदात्त होता है। यही अन्तर है दोनों में। ञित् णित् का मुख्य प्रयोजन तो आदिवृद्धि है। इन दोनों शब्दों से उस का मालिक इस अर्थ में भी ये ही प्रत्यय होते हैं। इसके लिए अग्रिम सूत्र है।