सप्तत्या क्रीतम् साप्ततिकम्। प्रास्थिकम्।
अब ठज् का अधिकार प्रारम्भ होता है। प्राग्वतेष्ठज् से तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः तक ठज् का अधिकार है। उसके अन्दर अण्, अज् आदि भी आते हैं। तद्धिताः, ड्याप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च और समर्थानां प्रथमाद्वा आदि का अधिकार है। अतः ड्यन्त, आबन्त और प्रातिपदिक से परे भी किये जाते ही हैं।
११४४- तेन क्रीतम्। तेन तृतीयान्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, क्रीतं प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में प्राग्वतेष्ठज् से ठज् और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ ही रहा है।
‘उससे खरीदा हुआ’ अर्थ में तृतीयान्त प्रातिपदिक से ठज् प्रत्यय होता है।
साप्ततिकम्। सत्तर रूपये से खरीदी गई वस्तु। सप्तत्या क्रीतम् लौकिक विग्रह और सप्तति टा अलौकिक विग्रह है। तेन क्रीतम् से ठज्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, ठस्येकः से इक आदेश, आदिवृद्धि, भसंज्ञक इकार का लोप, साप्तत्+इक=साप्ततिक बना। स्वादिकार्य करके साप्ततिकम् सिद्ध हुआ।
प्रास्थिकम्। प्रस्थ नामक प्राचीन काल की नापने की वस्तु, उससे खरीदी गई वस्तु। प्रस्थेन क्रीतम् लौकिक विग्रह और प्रस्थ टा अलौकिक विग्रह है। तेन क्रीतम् से ठज्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, ठस्येकः से इक आदेश, आदिवृद्धि,
भसंज्ञक अकार का लोप, प्रास्थ्+इक=प्रास्थिक, वर्णसम्मेलन और स्वादिकार्य करके प्रास्थिकम् सिद्ध हुआ।