वत्सेभ्यो हितम्- वत्सीयो गोधुक्।
११३९- तस्मै हितम्। तस्मै चतुर्थ्यन्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, हितं प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ ही रहा है।
चतुर्थ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक से उसके लिए हितकर अर्थ में 'छ' प्रत्यय होता है।
स्मरण रहे कि छ के स्थान ईय् आदेश होता है।
वत्सीयः (गोधुक्)। बछड़ों के लिए हितकारी गोदोहोन। वत्सेभ्यः हितम्
लौकिक विग्रह और वत्स भ्यस् अलौकिक विग्रह है। तस्मै हितम् से छ प्रत्यय, ईय आदेश करके भसंज्ञक अकार का लोप, वर्णसम्मेलन, सु आदि कार्य करने पर वत्सीयः सिद्ध होता है।