प्राक्क्रीतादित्येव। उवर्णान्ताद् गवादिभ्यश्च यत् स्यात्। छस्यापवादः।
शङ्कवे हितं शङ्कव्यं दारु। गव्यम्।
गणसूत्रम्- नाभि नभं च। नभ्योऽक्षः। नभ्यमञ्जनम्।
अब हित अर्थ में होने वाले छ और यत् प्रत्ययों का प्रकरण प्रारम्भ करते हैं। इस प्रकरण में प्राक्क्रीताच्छः से छः का अधिकार चलता है और तस्मै हितम् आदि सूत्रों से छ और उगवादिभ्यो यत् से यत् प्रत्यय होने के कारण यह प्रकरण छ और यत् दो ही प्रत्ययों का प्रकरण है। अत एव इसे छयतोरधिकार कहते हैं।
११३८- उगवादिभ्यो यत्। गो आदिर्येषां ते गवादयः। उश्च गवादयश्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्व उगवादयस्तेभ्यः। उगवादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, यत् प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ ही रहा है।
उवर्णान्त प्रातिपदिक से तथा गवादिगणपठित प्रातिपदिकों से परे प्राक्क्रीतीय अर्थों में तद्धितसंज्ञक यत् प्रत्यय होता है।
तकार इत्संज्ञक है, य बचता है। इस प्रकरण के सभी सूत्रों में छ का ही
अधिकार है, अतः छ प्रत्यय की प्राप्ति होती है किन्तु उगवादिभ्यो यत् इस विशेष सूत्र से बाधित हो जाने से उवर्णान्त और गवादिगणीय शब्दों से तो यत् ही होगा।
शङ्कव्यं दारु। कीली, खूँटी के लिए उपयुक्त लकड़ी। शङ्कवे हितम् लौकिक विग्रह और शङ्कु डे अलौकिक विग्रह हैं। तस्मै हितम् से छ प्रत्यय प्राप्त था, उसे बाधकर के उगवादिभ्यो यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्ध तकार की इत्संज्ञा करके लोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके शङ्कु+य बना। णित्, जित्, कित् आदि न होने के कारण वृद्धि का प्रसंग नहीं है और इकार या अकार के अन्त में न होने के कारण भसंज्ञक टिलोप का भी प्रसंग नहीं है। अतः ओर्गुणः से उकार को गुण होकर ओकार बन जाता है, जिससे शङ्को+य बना। वान्तो यि प्रत्यये से अव् आदेश होकर वर्णसम्मेलन करने पर शङ्कव्य बनता है। स्वादि कार्य करने पर शङ्कव्यम् सिद्ध होता है।
गव्यम्। गायों के लिए हितकारी घास, चारा आदि। गोभ्यो हितम् लौकिक विग्रह और गो भ्यस् अलौकिक विग्रह हैं। तस्मै हितम् से छ प्रत्यय प्राप्त था, उसे बाधकर उगवादिभ्यो यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्ध तकार की इत्संज्ञा और लोप करके प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके गो+य बना। णित्, जित्, कित् आदि न होने के कारण वृद्धि का प्रसंग नहीं है और इकार या अकार के अन्त में न होने के कारण टिलोप का भी प्रसंग नहीं है। वान्तो यि प्रत्यये से अव् आदेश होकर वर्णसम्मेलन करने पर गव्य बनता है। स्वादि कार्य करने पर गव्यम् सिद्ध होता है।
नाभि नभं च। यह गणसूत्र है। यत् प्रत्यय करते समय 'नाभि' के स्थान पर 'नभ' आदेश करना चाहिए।
नभ्योऽक्षः। रथचक्र की नाभि के लिए हितकर अर्थात् उपयुक्त चक्रदण्ड। नाभये हितम् लौकिक विग्रह और नाभि डे अलौकिक विग्रह हैं। तस्मै हितम् से छ प्रत्यय प्राप्त था, उसे बाधकर उगवादिभ्यो यत् से यत् प्रत्यय, और नाभि नभं च से नाभि के स्थान पर नभ आदेश करने पर नभ डे य बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके नभ+य बना। णित्, जित्, कित् आदि न होने के कारण वृद्धि का प्रसंग नहीं है। भसंज्ञक अकार का लोप करके नभ्य बनता है। स्वादि कार्य करने पर नभ्यः सिद्ध होता है। यदि अञ्जन आदि नपुंसक शब्द विशेष्य हो तो नभ्यम् ऐसा नपुंसक ही होगा।