Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 52
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VṛttiGovind
LSK 1140
छ-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
शरीरावयवाद्यत्
Aṣṭādhyāyī 5.1.6
Vṛtti Varadarājācārya

दन्त्यम्। कण्ठ्यम्। नस्यम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११४०- शरीरावयवाद्यत्। शरीरस्यावयवः शरीरावयवस्तस्मात्। शरीरावयवात् पञ्चम्यन्तं, यत् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तस्मै हितम् यह सूत्र अनुवृत्त होता है। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ ही रहा है।

शरीर के अवयववाचक चतुर्थ्यन्त प्रातिपदिक से हितकर अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।

तकार इत्संज्ञक है और यकार के परे होने पर प्रकृति की भसंज्ञा होती है, अतः पूर्व के इकार-अकार का लोप होता है।

दन्त्यम्। दाँतों के लिए हितकारी मंजन आदि। दन्तेभ्यः हितम् लौकिक विग्रह और दन्त भ्यस् अलौकिक विग्रह है। शरीरावयवाद्यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, भसंज्ञक अकार का लोप, वर्णसम्मेलन, सु आदि कार्य करने पर दन्त्यम् सिद्ध होता है।

कण्ठ्यम्। कण्ठ के लिए हितकारी लेप आदि। कण्ठाय हितम् लौकिक विग्रह और कण्ठ ङे अलौकिक विग्रह है। शरीरावयवाद्यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, अकार का लोप, वर्णसम्मेलन, सु आदि कार्य करने पर कण्ठ्यम् सिद्ध होता है।

नस्यम्। नाक के लिए हितकारी। नासिकायै हितम् लौकिक विग्रह और नासिका ङे अलौकिक विग्रह है। शरीरावयवाद्यत् से यत् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके पद्मोमास्हृन्निशसन्यूषन्दोषन्यकञ्छकन्नुदन्नासञ्छस्पप्रभृतिषु से नासिका के स्थान पर नस् आदेश होकर नस्+य बना। वर्णसम्मेलन, सु आदि कार्य करने पर नस्यम् सिद्ध होता है।