Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 52
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VṛttiGovind
LSK 1137
छस्याधिकारसूत्रम्
प्राक् क्रीताच्छः
Aṣṭādhyāyī 5.1.1
Vṛtti Varadarājācārya

तेन क्रीतमित्यतः प्राक् छोऽधिक्रियते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११३७- प्राक्क्रीताच्छः। प्राक् अव्ययपदं, क्रीतात् पञ्चम्यन्तं, छः प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्।

‘तेन क्रीतम्’ इस सूत्र से पहले तक ‘छ’ प्रत्यय का अधिकार रहता है।

तद्धितप्रकरण में प्रारम्भ से ही प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार चल ही रहा है। अतः स्वभावतः इस प्रकरण में भी रहेगा। छकार के स्थान पर आयनेयीनीयियः फढखछघां प्रत्ययादीनाम् से ईय् आदेश होकर ईय बन जाता है।