Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 51
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VṛttiGovind
LSK 1136
य-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
सभाया यः
Aṣṭādhyāyī 4.4.105
Vṛtti Varadarājācārya

सभ्य:।

इति यतोऽवधि:॥५१॥

(प्राग्वितीया:।)

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११३६. सभाया य:। सभाया: पञ्चम्यन्तं, य: प्रथमान्तं, द्विपदं सूत्रम्। तत्र साधु: का

.....

अनुवर्तन और प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्य्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।

सप्तम्यन्त सभा प्रातिपदिक से 'साधु' अर्थात् निपुण, कुशल, अच्छा आदि अर्थ में य प्रत्यय होता है।

सभ्यः। सभा में प्रवीण या योग्य। सभायां साधुः लौकिक विग्रह और सभा डि-अलौकिक विग्रह है। सभाया यः से य प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके भसंज्ञक आकार का लोप करने पर सभ्+य=सभ्य बना। सु, उसको रुत्व और विसर्ग करने पर सभ्यः सिद्ध हुआ।

परीक्षा

इस प्रकरण के सारे सूत्रों एवं उनके अर्थों पर प्रकाश डालते हुए दस प्रयोगों की सिद्धि दिखाइये।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

यदधिकार-प्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ छयतोरधिकारः