अग्रे साधु: अग्र्य:। सामसु साधु: सामन्य:।
ये चाभावकर्मणोरिति प्रकृतिभाव:- कर्मण्य:। शरण्य:।
११३५- तत्र साधु:। तत्र सप्तम्यन्तस्यानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, साधु: प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। यत्, प्रत्यय:, परश्च, ड्याप्रातिपदिकात्, तद्धिता: और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।
सप्तम्यन्त प्रातिपदिक से साधु, कुशल, प्रवीण या योग्य जैसे अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।
अग्र्य:। आगे रहने में प्रवीण या योग्य। अग्रे साधु: लौकिक विग्रह और अग्र डि अलौकिक विग्रह है। तत्र साधु: से यत् प्रत्यय, तकार का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके भसंज्ञक अकार का लोप करने पर अग्र्+य=अग्र्य बना। स्वादिकार्य करके अग्र्य: सिद्ध हुआ।
शरण्य:। रक्षा करने, शरण देने में प्रवीण या योग्य। शरणे साधु: लौकिक विग्रह और शरण डि अलौकिक विग्रह है। तत्र साधु: से यत् प्रत्यय, तकार का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके भसंज्ञक अकार का लोप करने पर शरण्+य=शरण्य बना। स्वादिकार्य करके शरण्य: सिद्ध हुआ।
कर्मण्य:। कर्म करने में प्रवीण या योग्य। कर्मणि साधु: लौकिक विग्रह और कर्मन् डि अलौकिक विग्रह है। तत्र साधु: से यत् प्रत्यय, तकार का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके कर्मन्+य बना। नस्तद्धिते से टि का लोप प्राप्त था किन्तु ये चाभावकर्मणो: से प्रकृतिभाव होकर टिलोप रूक गया। नकार को णत्व करने पर कर्मण्+य=कर्मण्य बना। स्वादिकार्य करके कर्मण्य: सिद्ध हुआ।