नावा तार्यं नाव्यं जलम्। वयसा तुल्यो वयस्यः। धर्मेण प्राप्यं धर्म्यम्।
विषेण वध्यो विष्यः। मूलेन आनाम्यं मूल्यम्। मूलेन समो
मूल्यः। सीतया समितं सीत्यं क्षेत्रम्। तुलया सम्मितं तुल्यम्।
११३४- नौ-वयो-धर्म-विष-मूल-मूल-सीता-तुलाभ्यस्तार्य-तुल्य-प्राप्य-वध्याऽऽनाम्य-सम-समित-सम्मितेषु। नौश्च वयश्च धर्मश्च विषञ्च मूलञ्च मूलञ्च सीता च तुला च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो नौवयोधर्मविषमूलमूलसीतातुलास्ताभ्यः। तार्यञ्च तुल्यञ्च प्राप्यञ्च वध्यञ्च आनाम्यञ्च समश्च समितञ्च सम्मितञ्च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वस्तार्य-तुल्य-प्राप्य-वध्याऽऽनाम्य-सम-समित-सम्मितानि तेषु। नौ-वयो-धर्म-विष-मूल-मूल-सीता-तुलाभ्यः पञ्चम्यन्तं, तार्य-तुल्य-प्राप्य- वध्याऽऽनाम्य-सम-समित-सम्मितेषु सप्तम्यन्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्यातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।
नौ, वयस्, धर्म, विष, मूल, मूल, सीता और तुला शब्दों से क्रमशः तारने योग्य, तुल्य, प्राप्य, वध्य, प्राप्त होने वाला लाभ, सम, एक समान करना और तौलना अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।
नाव्यम्। नौका के द्वारा पार ले जाने योग्य। नावा तार्यम् लौकिक विग्रह और नौ टा अलौकिक विग्रह है। नौ-वयो-धर्म-विष-मूल-मूल-सीता-तुलाभ्यस्तार्य-तुल्य-प्राप्य-वध्याऽऽनाम्य-सम-समित-सम्मितेषु से तार्य अर्थ में यत् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके नौ+य बना। वान्तो यि प्रत्यये से आव् आदेश होकर नाव्य बना और विभक्तिकार्य करके नाव्यम् सिद्ध हुआ।
वयस्यः। आयु से समान, मित्र आदि। वयसा तुल्यम् लौकिक विग्रह और वयस् टा अलौकिक विग्रह है। नौ-वयो-धर्म-विष-मूल-मूल-सीता-तुलाभ्यस्तार्य-तुल्य-प्राप्य-वध्याऽऽनाम्य-सम-समित-सम्मितेषु से तुल्य अर्थ में यत्, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके वयस्+य=वयस्य बना। विभक्ति कार्य करके वयस्यः सिद्ध हुआ।
धर्म्यम्। धर्म के द्वारा प्राप्त करने योग्य स्वर्ग, सुख, धन आदि। धर्मेण प्राप्यम् लौकिक विग्रह और धर्म टा अलौकिक विग्रह है। नौ-वयो-धर्म-विष-मूल-मूल-सीता-तुलाभ्यस्तार्य-तुल्य-प्राप्य-वध्याऽऽनाम्य-सम-समित-सम्मितेषु से प्राप्य अर्थ में यत् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् और भसंज्ञक अकार का लोप करके धर्म्+य=धर्म्य बना और विभक्ति कार्य करके धर्म्यः सिद्ध हुआ।
विष्यः। विष के द्वारा वध करने योग्य शत्रु आदि। विषेण वध्यः लौकिक विग्रह और विष टा अलौकिक विग्रह है। नौ-वयो-धर्म-विष-मूल-मूल-सीता-तुलाभ्यस्तार्य-तुल्य-प्राप्य-वध्याऽऽनाम्य-सम-समित-सम्मितेषु से वध्य अर्थ में यत् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् और भसंज्ञक अकार का लोप करके विष्+य=विष्य बना और विभक्ति कार्य करके विष्यः सिद्ध हुआ।
मूल्यम्। मूल अर्थात् पूँजी के द्वारा प्राप्त होने वाला लाभ। मूलेन आनाम्यम् लौकिक विग्रह और मूल टा अलौकिक विग्रह है। नौ-वयो-धर्म-विष-मूल-मूल-सीता-तुलाभ्यस्तार्य-तुल्य-प्राप्य-वध्याऽऽनाम्य-सम-समित-सम्मितेषु से आनाम्य अर्थ में यत् प्रत्यय हुआ। अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् और भसंज्ञक अकार का लोप करके मूल्+य=मूल्य बना और विभक्तिकार्य करके मूल्यम् सिद्ध हुआ।
इसी प्रकार मूलेन समो मूल से सम अर्थ में मूल्य:।
सीतया समितं हल से एक समान किया गया अर्थ सीत्यं क्षेत्रम्।
तुलया सम्मितं तराजू से तोला हुआ अर्थ में तुला शब्द से तुल्यम् बनाइये।