भस्य कुर्छुरोश्चोपधाया इको दीर्घो न स्यात्। धुर्यः। धौरेयः।
११३३- न भकुर्छुराम्। भं च कुर् च छुर् च तेषामितरेतरयोगद्वन्द्वो भकुर्छुरस्तेषाम्। न अव्ययपदं, भकुर्छुरां षष्ठ्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। वोरुपधाया दीर्घ इकः से उपधायाः और दीर्घः की अनुवृत्ति आती है।
भसंज्ञक की उपधा एवं कुर्, छुर् की उपधा को दीर्घ नहीं होता है।
हलि च से प्राप्त दीर्घ का निषेध होता है।
धुर्यः, धौरेयः। धुर् अर्थात् रथ का एक विशेष भाग, उसको ढोने वाला। धुरं वहति लौकिक विग्रह और धुर् अम् अलौकिक विग्रह है। धुरो यड्ढकौ से यत् प्रत्यय होने के पक्ष में तकार का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके धुर्+य=धुर्य बना। यहाँ हलि च से दीर्घ प्राप्त था, उसका न भकुर्छुराम् से निषेध हुआ। धुर्य से सु आदि कार्य करके धुर्यः सिद्ध हुआ। ढक् होने के पक्ष में ककार की इत्संज्ञा, ढकार के स्थान पर एय् आदेश करके धुर्+एय बना। कित् होने के कारण आदिवृद्धि करके धौर्+एय=धौरेय बना। स्वादिकार्य करके धौरेयः सिद्ध हुआ।