तस्मै हितम् इत्यतः प्राग् यदधिक्रियते।
अब यदधिकारप्रकरण प्रारम्भ होता है। इस प्रकरण में यत् प्रत्यय का विधान किया गया है और अधिकार भी यत् का ही है, इसलिए इसे यदधिकारप्रकरण कहते हैं। सूत्रों में तद्विताः, ड्याप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार विद्यमान है। प्राग्घिताद्यत् यह सूत्र तस्मै हितम् से पहले तक यत् के अधिकार का निर्णय करता है। यत् में तकार इत्संज्ञक है। जित्, णित् और कित् न होने से वृद्धि का प्रसङ्ग नहीं है।
११३०- प्राग्घिताद्यत्। प्राक् अव्ययपदं, हितात् पञ्चम्यन्तं, यत् प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्।
‘तस्मै हितम्’ से पहले तक यत् का अधिकार रहता है।