नैकटिको भिक्षुकः।
इति ठगधिकारः॥५०॥
( प्राग्वहतीयाः )
११२९- निकटे वसति। निकटे सप्तम्यन्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, वसति क्रियापदं, द्विपदं सूत्रम्। ठक्, प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।
सप्तम्यन्त 'निकट' प्रातिपदिक से 'रहने वाला' इस अर्थ में ठक् प्रत्यय होता है।
नैकटिकः। निकट में रहने वाला। निकटे वसति लौकिक विग्रह और निकट डि अलौकिक विग्रह है। निकटे वसति सूत्र से ठक्, अनुबन्धलोप, ठस्येकः से ठ के स्थान पर इक आदेश करके निकट+इक बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि हुई और भसंज्ञक अकार का लोप करके नैकट्+इक=नैकटिक बना। स्वादिकार्य करके नैकटिकः सिद्ध हुआ।
परीक्षा
१- विकारार्थक ठगधिकार प्रत्यय एवं उनके अर्थों पर प्रकाश डालिए।
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२- अवयवे च प्राणयोषधिवृक्षेभ्यः की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
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३- संस्कृतम् और रक्षति की उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
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४- अभी तक के तद्धित प्रत्ययों पर एक टिप्पणी लिखें
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५- विकारार्थक और ठगधिकार प्रत्यय के किन्हीं दस की प्रक्रिया दिखाइये।
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श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
ठगधिकार-प्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ यदधिकारः