Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 51
Show
VṛttiGovind
LSK 1131
यत्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम्
Aṣṭādhyāyī 4.4.76
Vṛtti Varadarājācārya

रथं वहति रथ्यः। युग्यः। प्रासङ्गच्चः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११३१- तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम्। तद् द्वितीयान्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, वहति क्रियापदं, रथयुगप्रासङ्गं द्वितीयान्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। प्राग्घिताद्यत् से यत् का तथा प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्विताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।

द्वितीयान्त रथ, युग और प्रासङ्ग प्रातिपदिकों से ‘वहति’ अर्थात् वहन करता है या वहन करने वाला अर्थ में यत् प्रत्यय होता है।

रथ का अर्थ प्रसिद्ध ही है। रथ या हल आदि खींचने के लिए घोड़ा, बैल आदि के गले में जो लकड़ी डाली जाती है, उस लकड़ी को युग कहते हैं तो अशिक्षित बैल आदि को शिक्षित करने के लिए युग के साथ जो एक अन्य युग को गले में डाल देते हैं, उस लकड़ी को प्रासङ्ग कहते हैं। इस तरह रथ, युग और प्रासङ्ग को ढोने वाले को रथ्य, युग्य और प्रासङ्ग्य कहते हैं।

रथ्यः। रथ को ढोने वाला। रथं वहति लौकिक विग्रह और रथ अम् अलौकिक विग्रह है। तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम् से यत् प्रत्यय, तकार का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके रथ+य बना। भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप हुआ, रथ्+य=रथ्य बना। सु आदि कार्य करके रथ्यः सिद्ध हुआ।

युग्यः। युग अर्थात् रथ या हल की एक विशेष लकड़ी को ढोने वाला। युगं वहति लौकिक विग्रह और युग अम् अलौकिक विग्रह है। तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम् से यत् प्रत्यय, तकार का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके युग+य बना। भसंज्ञक अकार का यस्येति च से लोप हुआ, युग्+य=युग्य बना। सु आदि कार्य करके युग्यः सिद्ध हुआ। इसी तरह प्रासङ्गं वहति लौकिक विग्रह और प्रासङ्ग अम् अलौकिक विग्रह में यत् प्रत्यय करके प्रासङ्ग्यः बना लीजिए।