अपूपभक्षणं शीलमस्य आपूपिकः।
११२८- शीलम्। शीलं प्रथमान्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तदस्य पण्यम् से तद् और अस्य की अनुवृत्ति आती है। ठक्, प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।
'यह स्वभाव है इसका' इस अर्थ में प्रथमान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है।
आपूपिकः। मालपूए खाने का स्वभाव है जिसका अर्थात् मालपूआ खाने वाला। अपूपभक्षणं शीलम् अस्य लौकिक विग्रह और अपूप सु अलौकिक विग्रह है। शीलम् सूत्र से ठक्, अनुबन्धलोप, ठस्येकः से ठ के स्थान पर इक आदेश करके अपूप+इक बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि हुई और भसंज्ञक अकार का लोप करके आपूप्+इक=आपूपिक बना। स्वादिकार्य करके आपूपिकः सिद्ध हुआ।
इसी तरह से ऐसा स्वभाव है इसका इस अर्थ में अन्य शब्दों से भी ठक् करके प्रयोग सिद्ध करें। जैसे-
मोदकभक्षणं शीलमस्य- मौदकिकः। मोदक खाने का स्वभाव वाला।
शष्कुलीभक्षणं शीलमस्य- शाष्कुलिकः। पूडी खाने का स्वभाव वाला।
ओदनभक्षणं शीलमस्य- औदनिकः। भात खाने का स्वभाव वाला।
पायसभक्षणं शीलमस्य- पायसिकः। खीर खाने का स्वभाव वाला।
करुणा शीलमस्य- कारुणिकः। करुणा स्वभाव वाला।