Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 50
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VṛttiGovind
LSK 1127
ठक्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
प्रहरणम्
Aṣṭādhyāyī 4.4.57
Vṛtti Varadarājācārya

तदस्येत्येव। असिः प्रहरणमस्य आसिकः। धानुष्कः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११२७- प्रहरणम्। प्रहरणं प्रथमान्तमेकपदं सूत्रम्। तदस्य पण्यम् से तदस्य की अनुवृत्ति आती है। ठक्, प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।

'हथियार है इसका' इस अर्थ में प्रथमान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है।

आसिकः। तलवार है प्रहरण अर्थात् हथियार जिसका, वह। असिः प्रहरणम् अस्य लौकिक विग्रह और असि सु अलौकिक विग्रह है। प्रहरणम् सूत्र से ठक्, अनुबन्ध लोप, ठस्येकः से ठ के स्थान पर इक आदेश करके असि+इक बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि हुई और भसंज्ञक इकार का लोप करके आस्+इक=आसिक, स्वादिकार्य करके आसिकः सिद्ध हुआ।

धानुष्कः। धनुष है प्रहरण अर्थात् हथियार जिसका, वह। धनुः प्रहरणम् अस्य लौकिक विग्रह और धनुष् सु अलौकिक विग्रह है। तदस्य प्रहरणम् सूत्र से ठक्, अनुबन्ध लोप, ठस्येकः से ठ के स्थान पर इक आदेश प्राप्त था, उसे बाधकर इसुसुक्तान्तात्कः से क आदेश करके धनुष्+क बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि हुई और ष् के असिद्ध होने से रुत्वविसर्ग, फिर इणः षः से षकार ही होकर धानुष्+क=धानुष्क बना। स्वादिकार्य करके धानुष्कः सिद्ध हुआ।