Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 50
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VṛttiGovind
LSK 1125
ठक्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
धर्मं चरति
Aṣṭādhyāyī 4.4.41
Vṛtti Varadarājācārya

धार्मिकः।

वार्तिकम्- अधर्माच्चेति वक्तव्यम्। आधर्मिकः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

११२५- धर्मं चरति। धर्मं द्वितीयान्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, चरति क्रियापदं द्विपदमिदं सूत्रम्। ठक्, प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।

‘धर्म का आचरण करता है’ इस अर्थ में द्वितीयान्त प्रातिपदिक धर्म-शब्द से ठक् प्रत्यय होता है।

धार्मिकः। धर्म का आचरण करने वाला। धर्मं चरति लौकिक विग्रह और धर्म अम् अलौकिक विग्रह है। धर्मं चरति से ठक्, अनुबन्धलोप, ठस्येकः से ठ के स्थान पर इक आदेश करके धर्म+इक बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि हुई और भसंज्ञक अकार का लोप करके धर्म+इक=धार्मिक बना। स्वादिकार्य करके धार्मिकः सिद्ध हुआ।

अधर्माच्चेति वक्तव्यम्। यह वार्तिक है। जिस तरह से धर्म शब्द से ठक् प्रत्यय होता है, उसी तरह अधर्म से भी होना चाहिए।

यहाँ पर यह प्रश्न हो सकता है कि यदि धार्मिक बनने के बाद नञ् समास करें तो क्या होगा? उत्तर यह है कि तब अधार्मिकः। इस तरह अधार्मिकः ऐसा रूप बन सकता है किन्तु आधार्मिकः नहीं बनेगा। अतः आधार्मिकः की सिद्धि के लिए इस वार्तिक की आवश्यकता है।