तृतीयान्तादृ गच्छति-भक्षयतीत्यर्थयोष्ठक् स्यात्।
हस्तिना चरति हास्तिकः। दध्ना चरति दाधिकः।
११२०- चरति। चरति क्रियापदम् एकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तेन दीव्यति खनति जयति जितम् से तेन की अनुवृत्ति आती है और ठक्, प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्यातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।
‘उससे जाता है और उससे खाता है’ इस अर्थ में तृतीयान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है।
चरति में चर् धातु के दो अर्थ होते हैं- गति और भक्षण करना।
हास्तिकः। हाथी से जाता है जो। हस्तिना चरति लौकिक विग्रह और हस्तिन् टा अलौकिक विग्रह है। चरति से ठक्, अनुबन्धलोप, ठस्येकः से ठ के स्थान पर इक आदेश करके हस्तिन्+इक बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि हुई और टिसंज्ञक इन् का नस्तद्धिते से लोप करके हास्त्+इक=हास्तिक बना एवं स्वादिकार्य करके हास्तिकः सिद्ध हुआ।
दाधिकः। दही से खाता है जो। दध्ना चरति लौकिक विग्रह और दधि टा अलौकिक विग्रह है। चरति से ठक्, अनुबन्धलोप, ठस्येकः से ठ के स्थान पर इक आदेश करके दधि+इक बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि हुई और भसंज्ञक इकार का लोप करके दाध्+इक=दाधिक बना एवं स्वादिकार्य करके दाधिकः सिद्ध हुआ।