Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 50
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VṛttiGovind
LSK 1119
ठक्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तरति
Aṣṭādhyāyī 4.4.5
Vṛtti Varadarājācārya

तेनेत्येव। उडुपेन तरति- औडुपिकः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१११९- तरति। तरति क्रियापदम् एकपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में तेन दीव्यति खनति जयति जितम् से तेन की अनुवृत्ति आती है और ठक्, प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।

‘उससे तरता है अर्थात् पार हो जाता है’ इस अर्थ में तृतीयान्त प्रातिपदिक से ठक् प्रत्यय होता है।

औडुपिकः। छोटी नौका से पार करता है जो। उडुपेन तरति लौकिक विग्रह और उडुप टा अलौकिक विग्रह है। तरति से ठक्, अनुबन्धलोप, ठस्येकः से ठ के स्थान पर इक आदेश करके उडुप+इक बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि हुई। भसंज्ञक अकार का लोप करके औडुप्+इक=औडुपिक बना। स्वादिकार्य करके औडुपिकः सिद्ध हुआ।