Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 50
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VṛttiGovind
LSK 1117
ठक्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
तेन दीव्यति खनति जयति जितम्
Aṣṭādhyāyī 4.4.2
Vṛtti Varadarājācārya

अक्षैर्दीव्यति खनति जयति जितो वा आक्षिकः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१११७- तेन दीव्यति खनति जयति जितम्। तेन तृतीयान्तानुकरणं लुप्तपञ्चमीकं, दीव्यति, खनति, जयति क्रियापदानि, जितम् प्रथमान्तम् अनेकपदं सूत्रम्। ठक्, प्रत्ययः, परश्च, ड्याप्प्रातिपदिकात्, तद्धिताः और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार है।

खेलने वाला, खोदने वाला, जीतने वाला, जीता गया इन अर्थों में तृतीयान्त प्रातिपदिकों से ठक् प्रत्यय होता है।

आक्षिकः। पासों से खेलने वाला, पासों से खोदने वाला, पासों से जीतने वाला, पासों से जीता गया। अक्षैर्दीव्यति, खनति, जयति, जितम्। अक्ष भिस् में तेन दीव्यति खनति जयति जितम् से ठक् प्रत्यय, अनुबन्धलोप करके अक्ष भिस् ठ की प्रातिपदिकसंज्ञा, सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से सुप् भिस् का लुक् करके अक्ष+ठ बना। ठस्येकः से ठ के

स्थान पर इक आदेश होकर अक्ष+इक बना। कित् होने के कारण किति च से आदिवृद्धि हुई- आक्ष+इक बना। यस्येति च से भसंज्ञक अकार का लोप हुआ- आक्ष+इक बना। वर्णसम्मेलन होने पर आक्षिक बना। सु, रुत्वविसर्ग करके आक्षिकः सिद्ध हुआ।