तद्वहतीत्यतः प्राक् ठगधिक्रियते।
अब ठगधिकारप्रकरण का आरम्भ होता है। इस प्रकरण में प्राग्वहतेष्ठक् इस सूत्र का अधिकार चलता है अर्थात् इस सूत्र से तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम् ४।४।७६ तक के जितने भी सूत्र हैं, उन सूत्रों में ठक् पहुँच जाता है। ठक् प्रत्यय का अधिकार होने के कारण इस प्रकरण को ठगधिकारप्रकरण कहते हैं। ठक् में ककार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा और उसका तस्य लोपः से लोप होता है। ठ के स्थान पर इसुसुक्तान्तात् कः से क या ठस्येकः से इक आदेश होता है। ठक् में ककार की इत्संज्ञा होने के कारण इसके परे रहते किति च से प्रकृति में आदिवृद्धि होती है।
१११६- प्राग्वहतेष्ठक्। प्राक् अव्ययपदं, वहतेः पञ्चम्यन्तं, ठक् प्रथमान्तं, त्रिपदं सूत्रम्।
इस सूत्र से तद्वहति रथयुगप्रासङ्गम् से पहले तक 'ठक्' का अधिकार रहता है।