Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 49
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VṛttiGovind
LSK 1115
यत्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
गोपयसोर्यत्
Aṣṭādhyāyī 4.3.160
Vṛtti Varadarājācārya

गव्यम्। पयस्यम्।

इति विकारार्थाः॥४९॥

इति प्राग्दीव्यतीयाः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१११५- गोपयसोर्यत्। गोश्च पयस् च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वो गोपयसौ, तयोः। गोपयसोः पञ्चम्यर्थे षष्ठी, यत् प्रथमान्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। तस्य विकारः आदि की अनुवृत्ति और तद्धिताः, प्रत्ययः, परश्च, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि पदों का अधिकार आ ही रहा है।

.....

विकार और अवयव अर्थ में षष्ठ्यन्त गो और पयस् शब्दों से यत् प्रत्यय होता है।

तकार इत्संज्ञक है।

गव्यम्। गाय का विकार अर्थात् दूध, दही, घी, मूत्र एवं गोवर। गोः विकारः लौकिक विग्रह और गो ङस् अलौकिक विग्रह है। गोपयसोर्यत् से यत् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप होकर गो+य बना। वान्तो यि प्रत्यये से अव् आदेश होकर गव्य बना। सु, अम्, गव्यम्।

पयस्यम्। दूध का विकार अर्थात् दही, घी आदि। पयसः विकारः लौकिक विग्रह और पयस् ङस् अलौकिक विग्रह है। गोपयसोर्यत् से यत् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप होकर पयस्+य=पयस्य बना। सु, अम्, पयस्यम्।

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

विकारार्थक-प्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ ठगधिकारः