Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 49
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VṛttiGovind
LSK 1113
मयट्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
नित्यं वृद्धशरादिभ्यः
Aṣṭādhyāyī 4.3.144
Vṛtti Varadarājācārya

आम्रमयम्। शरमयम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१११३- नित्यं वृद्धशरादिभ्यः। शर आदिर्येषां ते शरादयस्तेभ्यः। वृद्धाश्च शरादयश्च

वृद्धशरादयस्तेभ्यः। नित्यं द्वितीयान्तं क्रियाविशेषणम्। वृद्धशरादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, द्विपदं सूत्रम्। तस्य विकारः से तस्य और मयड् वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः से वा छोड्कर सभी पदों की अनुवृत्ति है। तद्धिताः, प्रत्ययः, परश्च, समर्थानां प्रथमाद्वा आदि पदों का अधिकार आ ही रहा है।

षष्ठ्यन्त वृद्धसंज्ञक प्रातिपदिकों एवं शरादिगणपठित प्रातिपदिको से विकार और अवयव अर्थ में नित्य से मयट् प्रत्यय होता है किन्तु वे विकार या अवयव भक्ष्य एवं आच्छादन नहीं होने चाहिए।

आम्रमयम्। आम्रवृक्ष का विकार या अवयव। आम्रस्य विकारोऽवयवो वा। आम्र डस् में तस्य विकारः के अधिकार में नित्यं वृद्धशरादिभ्यः से नित्य से मयट् प्रत्यय, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिककसंज्ञा, सुप् का लुक् करके आम्रमय बना। णित् आदि न होने से आदिवृद्धि नहीं हुई। स्वादिकार्य करके आम्रमयम् सिद्ध हुआ। इसी तरह शराणां विकारः सरकंडों का विकार या अवयव अर्थ में शर आम् में उक्त रीति से मयट् करके शरमयम् बनाया जा सकता है।