Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 49
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VṛttiGovind
LSK 1112
मयट्-प्रत्ययविधायकं विधिसूत्रम्
मयड्वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः
Aṣṭādhyāyī 4.3.143
Vṛtti Varadarājācārya

प्रकृतिमात्रान्मयड् वा स्याद् विकारावयवयोः। अश्ममयम्, आश्मनम्।

अभक्ष्येत्यादि किम्? मौद्गः सूपः। कार्पासमाच्छादनम्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

१११२- मयड् वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः। भक्ष्यं च आच्छादनं च तयोरितरेतरयोगद्वन्द्वो भक्ष्याच्छादने, न भक्ष्याच्छादने अभक्ष्याच्छादने, तयोरभक्ष्याच्छादनयोः। तस्य विकारः से तस्य की अनुवृत्ति आती है। तद्धिताः, ड्याप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च और समर्थानां प्रथमाद्वा का अधिकार आ ही रहा है।

प्रकृतिमात्र अर्थात् षष्ठ्यन्त समर्थ प्रातिपदिक से विकार और अवयव अर्थ में विकल्प से मयट् प्रत्यय होता है किन्तु विकार या अवयव जो हैं, वे भक्ष्य एवं आच्छादन नहीं होने चाहिए।

भक्ष्य(खाने योग्य वस्तु) और आच्छादन(ढकने वाली वस्तु, ओढ़ना आदि) यदि गम्यमान हो रहा हो तो यह प्रत्यय नहीं होगा। टकार की इत्संज्ञा होकर मय बचता है। टित् का फल स्त्रीत्वविवक्षा में टिड्ढाणञ्० की प्रवृत्ति है।

अश्ममयम्। पत्थर का विकार अथवा पत्थर से बना हुआ कोई पदार्थ। अश्मनो विकारः लौकिक विग्रह और अश्मन् डस् अलौकिक विग्रह है। मयड् वैतयोर्भाषायाम-भक्ष्याच्छादनयोः से मयट् प्रत्यय हुआ, अनुबन्धलोप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक्, अश्मन्+मय बना। णित् न होने के कारण आदिवृद्धि नहीं हुई और स्वादिष्वसर्वनामस्थाने से पदत्व होने के कारण नकार का न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य से लोप हुआ, अश्म+मय=अश्ममय बना। स्वादिकार्य करके अश्ममयम् सिद्ध हुआ। मयट् न होने के पक्ष में तस्य विकारः से औत्सर्गिक अण् करके टिलोप करने पर आश्मम् बनता है। अवयव अर्थ में अण् होने पर टि का लोप भी नहीं होता, अतः आश्मनम् भी बना चुके हैं।

अभक्ष्येत्यादि किम्? मौद्गः सूपः, कार्पासम् आच्छादनम्। अब यहाँ पर प्रश्न करते हैं कि मयड् वैतयोर्भाषायामभक्ष्याच्छादनयोः इस सूत्र में अभक्ष्याच्छादनयोः यह पद न पढ़ते तो क्या होता? उत्तर यह है कि मौद्गः सूपः, कार्पासम् आच्छादनम् आदि जगहों पर मुद्ग और कार्पास ये क्रमश भक्ष्य और आच्छादन वस्तु हैं। इनमें भी मयट् होने लगता और मुद्गमयम्, कार्पासमयम् ऐसे अनिष्ट रूप बनने लगते। अनिष्ट रूपों के निवारणार्थ उक्त पद सूत्र में पठित है, जिससे मयट् नहीं हुआ अपितु औत्सर्गिक अण् होकर मौद्गः, कार्पासम् ये इष्ट रूप सिद्ध हो गये।